भूमिका
इस खण्डमें १ जूनसे १५ अक्तूबर १९२९ तक लगभग साढ़े चार महीनोंकी सामग्री संग्रहीत है। इस पूरी अवधि में गांधीजी स्वतन्त्रता-संग्रामके उस आगामी संघर्षके विषय में जनताको समझाते रहे, एक वर्ष पहले के कलकत्ता कांग्रेसके प्रस्तावके अनुसार जिसके छेड़े जानेकी सम्भावना थी। अप्रैल और मई में आन्ध्रका जो लगातार दौरा हुआ, उसमें वे थक गये और विश्रामके विचारसे अलमोड़ा-अंचल स्थित कौसानी चले गये। वहाँ उन्होंने 'भगवद्गीता' का गुजराती अनुवाद पूरा किया। वे इस कामको कुछ दिनों पहले हाथमें ले चुके थे; यहाँ वह समाप्त हुआ और बादमें 'अनासक्तियोग' के नामसे प्रकाशित हुआ। आन्ध्रके दौरेमें गांधीजीने भोजनके जो प्रयोग किये वे भी इस खण्डकी सामग्रीमें आ जाते हैं। जुलाई-अगस्त में गांधीजीने अहमदाबाद कपड़ा मिलोंके मजदूरोंके वेतनका प्रश्न भी, जो उनके सामने सेठ मंगलदास गिरधरदासने पंचायतके स्थायी सदस्यकी हैसियतसे रखा था, बारीकीसे देखा-समझा और अपने पक्षका समर्थन करते हुए एक वक्तव्य भी किसी निर्णायकके सामने रखनेके लिए तैयार किया। (पृष्ठ ४०४-८) सितम्बरके पहले सप्ताहमें गांधीजीने अपनी यात्रा फिरसे शुरू की और उत्तरप्रदेशमें खादीका प्रचार करनेके लिए निकल पड़े।
खण्डका प्रारम्भ होता है विदेशी वस्त्र बहिष्कार समितिके कामके जायजेसे। गांधीजीने समितिके सदस्य जयरामदास दौलतरामको "कर्त्तव्यनिष्ठ और उत्साही सचिव" कहकर उनकी प्रशंसा की, किन्तु इस बातकी शिकायत भी की कि आमतौर पर नेताओंमें खादी कार्यक्रमके प्रति प्रामाणिकताका अभाव रहा है। उन्होंने इस बातपर जोर दिया कि बहिष्कार-आन्दोलनको सफल बनानेके लिए खादीका उत्पादन बढ़ाना निहायत जरूरी है; उन्होंने इसके उपाय भी सुझाये। उन्होंने खादी कार्यक्रमके प्रति लोगोंकी उपेक्षाका एक कारण बताते हुए कहा, "कांग्रेसकी प्रतिष्ठा जितनी व्यापक हुई है उसकी ज्ञान-शक्ति उसी अनुपात में व्यापक नहीं हुई, यह दुःखकी बात है। पर कौन जाने, सन्धिकालमें यहीं अनिवार्य था। सरकारी साँचेमें ढले विदेशी अर्थ-शास्त्रके विद्यार्थी कांग्रेसकी ग्रामाभिमुखता देनेवाली अर्थ-नीतिकी कद्र नहीं कर सके, उससे समरस नहीं हो सके, आवश्यक त्याग नहीं कर सके, इसलिए उन्होंने उसे छोड़ दिया।" (पृष्ठ २९९) इस उपेक्षाका दूसरा कारण था लोगोंके मनमें कुछ भी कर सकनेकी अपनी शक्तिके प्रति अविश्वास। और यह अविश्वास इस कारण था कि उन्होंने गुलामीको अपनी स्वाभाविक अवस्था ही मान लिया था : "यह हालत प्रत्येक मनुष्यके लिए दुःखद और पतनकारी है"। (पृष्ठ ६५)