शिकार बन जाता होऊँगा, मैं क्या जानूं? अतएव ऊपरकी पंक्तियाँ छापकर और उनका सन्दर्भ देकर ईश्वरसे मायासे बचा लेनेकी प्रार्थना करता हुआ मैं शान्तिका अनुभव करता हूँ। विवेकशील पाठक इसमें से एक सबक जरूर ले सकते हैं। मैं 'महात्मा' कहलाता हूँ। इस कारण कोई यह मानकर न चले कि मेरी सब बातें सच ही होती हैं। हम नहीं जानते कि 'महात्मा' क्या है, कौन है? सच्ची बात तो यह है कि 'महात्मा' शब्दको भी बुद्धिकी कसौटीपर चढ़ा कर देखना चाहिए। और अगर यह पूरा न उतरे तो उसका त्याग करना चाहिए।
दक्षिणमें अकाल
राजाजीने उक्त विषयमें फिरसे अपनी झोली फैलाई है। उनके सभी काम स्पष्ट मर्यादित और कारगर होते हैं। जहाँ कुछ लोग सुखसे रह रहे हैं और अनेक कष्ट भोग रहे हैं वहाँ जिनके पास देने को है वे देकर मदद पहुँचाते हैं। राजाजीकी पहली माँगका पाठकोंने समुचित आदर किया था। मुझे आशा है कि यह अतिरिक्त माँग भी समयपर पूरी कर दी जायेगी।
[गुजरातीसे]
नवजीवन, १६-६-१९२९
५०. विद्यार्थी
प्रेम [विद्याल]य
१[६ जून, १९२]९[१]
जो विद्याका भूखा है सो विद्यार्थी। विद्या अर्थात् जानने योग्य ज्ञान। जानने के योग्य तो आत्मा ही है। इसलिए विद्याका अर्थ हुआ आत्मविद्या। किन्तु आत्मज्ञान प्राप्त करनेके लिए साहित्य, इतिहास, भूगोल, गणित इत्यादि जानना चाहिए। ये सब साधन-रूप हैं। इन विषयोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए अक्षरज्ञान आवश्यक माना गया है। बिना अक्षर-ज्ञानके भी ज्ञानी होते हैं, यह बात अनुभवमें आई है। जो इसे जानता है वह अक्षर ज्ञान अथवा साहित्य आदिके ज्ञानके पीछे पागल नहीं होता। वह तो आत्मज्ञानके लिए व्याकुल होता रहता है।
जो-जो बातें आत्मज्ञान प्राप्त करने में विघ्न रूप बनती हैं, वह उनका त्याग करता है और जो सहायक होती हैं उनका सेवन करता है। जो इस बात को समझता है उसका विद्यार्थी जीवन कभी समाप्त नहीं होता और वह खाते, पीते, सोते, खेलते, खोदते, बुनते, कातते—सारी क्रियाओंको करता हुआ ज्ञान ही प्राप्त करता रहता है। इसके लिए अवलोकन-शक्तिका विकास किया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्तिको हमेशा
- ↑ गांधीजी इसी तारीखको प्रेम विद्यालय पहुंचे थे।