शिक्षक-समुदायकी जरूरत नहीं पड़ती अथवा कह सकते हैं कि वह समस्त जगतको शिक्षक रूपमें गिनता है और प्रत्येक वस्तुसे गुण ग्रहण करता रहता है।
बापू
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰ –२) की माइक्रोफिल्मसे।
५१. पत्र : प्रभावतीको
१६ जून, १९२९
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें भेज देनेके बाद थोड़ी चिन्ता हुई थी। वह पत्र मिलने से दूर हो गई। मुगलसराय में गाड़ीका पता चलाने और जगह प्राप्त करनेमें कोई कठिनाई तो नहीं हुई? क्या भाड़ा दससे कुछ ज्यादा देना पड़ा था? गीता, गणित और अंग्रेजीका रोज अध्ययन करना। रोज दैनन्दिनी लिखना। संस्कृत जानने वाले किसी व्यक्तिके पास बैठकर श्लोकोंका उच्चारण करना और डरना नहीं। पिताजी के स्वास्थ्यका समाचार लिखना। हम सब मजे में हैं। ठण्ड तो यहाँ भी है ही।
बापूके आशीर्वाद
द्वारा बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद
डा॰ खा॰ सिवान
जिला छपरा, बिहार
गुजराती (जी॰ एन॰ ३३५१) की फोटो-नकलसे।
५२. भाषण: प्रेमविद्यालय ताड़ीखेतमें[१]
१६ जून, १९२९
यहाँ आनेसे पहले ही मैं आप लोगोंके दुःख और दर्दका किस्सा सुन चुका हूँ। मेरे पास इसका एक ही अक्सीर उपाय है, और वह है, आत्मशुद्धि एवं कर्त्तव्यपरायणता। हमारी तमाम व्याधियोंका मूल कारण हमारे मनकी संकुचितता है। हम कुटुम्बके लिए मर-मिटनेके धर्मको तो समझते हैं, मगर अब एक कदम और आगे बढ़ाने की जरूरत है । हमारे कुटुम्ब प्रेम में सारे गाँवको स्थान मिलना चाहिए; गाँव में ताल्लुकेको, ताल्लुकेमें जिलेको, जिलेमें प्रान्तको, यहाँतक कि आखिरकार सारा संसार हमारे लिए कुटम्बवत् हो जाये। भारतके किसी भी कोनेसे आनेवाले मनुष्यकी सेवा
- ↑ यह भाषण वार्षिकोत्सवमें अध्यक्षको हैसियतसे दिया गया था। इसे यहाँ प्यारेलालकी यात्रा-विवरणसे उद्धृत किया गया है।