कहा है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ और आशा रखता हूँ कि आप भी इस यज्ञमें पूरा-पूरा हाथ बँटायेंगे ।
मैं सब धर्मोको सच्चे मानता हूँ । मगर ऐसा एक भी धर्म नहीं है जो सम्पूर्णता का दावा कर सके। क्योंकि धर्म तो हमें मनुष्य-जैसी अपूर्ण सत्ता द्वारा मिलता है; अकेला ईश्वर ही सम्पूर्ण है। अतएव हिन्दू होनेके कारण अपने लिए हिन्दू धर्मको सर्वश्रेष्ठ मानते हुए भी मैं यह नहीं कह सकता कि हिन्दू धर्म सबके लिए सर्वश्रेष्ठ है; और इस बातकी तो स्वप्नमें भी आशा नहीं रखता कि सारी दुनिया हिन्दू-धर्म को अपनाये । आपको भी यदि अपने गैर-ईसाई भाइयोंकी सेवा करनी है, तो आप उनकी सेवा उन्हें ईसाई बनाकर नहीं, बल्कि उनके धर्मको त्रुटियोंको दूर करनेमें और उसे शुद्ध बनाने में उनकी सहायता करके भी कर सकते हैं ।
जिस समाज में आपने जन्म लिया है, जिस देशका आपने अन्न खाया है, उसका तिरस्कार करना आपको शोभा नहीं देता। किसी चीजके साथ असहयोग करना धर्म्य हो सकता है, बशर्ते कि उसमें दुष्टताका कोई खास तत्त्व हो । भारतको प्राचीन संस्कृति और सभ्यता, जिसके फलस्वरूप देशमें इतने बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हो गये हैं, जिसने श्री चैतन्य और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे सुपुत्रोंको जन्म दिया है, और जिसके लिए आज भी कितनी ही पवित्र आत्माएँ तपश्चर्या कर रही हैं, विश्वासघात के योग्य नहीं है। आपके विचारानुसार अगर गैर-ईसाई लोग अन्धकारमें पड़े हैं, तो वे इस सभ्यताके सच्चे प्रतिनिधि भले न हो सकें; मगर आपको, जैसा कि आप दावा करते हैं, अगर सच्चा ज्ञान मिला है, तो इस सभ्यताका संरक्षक बनना चाहिए, नाशक नहीं ।
आज हमारे धनवान लोग गरीबोंके कन्धोंपर चढ़ बैठे हैं। अगर आपको गरीबों के साथ सच्चा हेलमेल पैदा करना है, करोड़ोंकी सेवा करनी है, और स्वेच्छासे निर्धन बने हुए नहीं बल्कि अनिच्छासे दारिद्रय पीड़ित जनताकी सहायता करनी है, तो चर्खा यज्ञमें हाथ बँटाना ही उसका एकमात्र उपाय है।
हिन्दी नवजीवन, ४-७-१९२९