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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४१७

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भारतीय डोलीवाहक दल

करना था। हममेंसे किसीके पास हथियार नहीं थे और चूंकि घुड़सवार हमारे आगे-आगे सरपट भागते चले जा रहे थे और हम उनके पीछे थे, हमारे और उनके बीच में बहुत जल्दी बहुत फर्क पड़ गया। फिर भी हम चलते और शक्तिभर उनसे मिलने की कोशिश करते रहे; परन्तु यह एक असम्भव कार्य था । इसके कारण पृष्ठरक्षक टुकड़ी और हमारे बीचमें प्रायः बहुत अन्तर होता था । जब दिन निकला, तब घुड़सवारोंकी गति स्वाभाविक रूपसे और भी तेज हो गई और हमारे और उनके बीचका अन्तर बढ़ने लगा। फिर भी घुड़सवारोंके पीछे दौड़ने या विद्रोहियोंके असेगाई हथियारोंसे घायल होने के सिवाय हमारे लिए कोई दूसरा चारा नहीं था। शायद एक बार हम बाल- बाल बचे । ७ बजे हमसे कुछ दूरीपर टुकड़ियाँ कार्रवाई कर रही थीं। हम भी आगे बढ़ रहे थे; उस समय हमें एक काफिर मिला जो राजभक्तिका चिह्न धारण किये हुए नहीं था । वह असेगाई हथियारसे लैस था और अपनेको छुपाये हुए था। फिर भी हम लोग कुशलतापूर्वक आगेकी पहाड़ीपर की और टुकड़ियोंसे, जब वे नीचेकी झाड़ियाँ अपनी कड़ाबीनोंसे साफ कर रही थीं, जा मिले। इस तरह हमें एक ऐसा कूच पूरा करना पड़ा जो, जान पड़ता था, कभी खत्म ही न होगा । हमें बार-बार उमवोटी नदीको पार करना पड़ता था । इसके लिए भारी जूते और पट्टियाँ निकालनी पड़ती थीं। इस दृष्टिसे यह बहुत ही कठिन काम था। एक व्यक्ति एक बहुत ही गम्भीर दुर्घटनामें पड़ गया होता, परन्तु बाल-बाल बच गया; और जब वह नदी पार करके निकला तो उसकी पट्टियाँ गायब हो चुकी थीं और उसके अँगूठेसे खूनकी धार बह रही थी। फिर भी वह हम लोगोंके साथ वीरतापूर्वक कूच करता गया । शाम होते-होते एक घाटीके चढ़ावके पास टुकड़ी रुक गई और उसने वहाँ डेरा डाला ।

"थककर चूर"

हम सब थककर चूर हो गये थे। सौभाग्यसे हमारे दलमें कोई हताहत नहीं हुआ था । यदि ऐसा होता, तो यह कहना कठिन है कि हम इस थकी हुई हालतमें घायलोंको ले जाने में किस हद तक सफल होते । यद्यपि, इन पंक्तियोंके लेखकको पूर्ण विश्वास है कि हमारा दल प्रधान रूपसे अपने कर्तव्यसे प्रेरित था इसलिए भगवानने हमें ऐसा कोई भी काम करनेकी पूरी-पूरी ताकत भी दी होती । कमसे-कम जब हम जैसे-तैसे आगे बढ़ रहे थे तब हँसते हुए घुड़सवारोंने करुणा और उपहास- मिश्रित शब्दोंमें हमसे पूछा कि यदि ऐसी हालत में हमें किसी घायलको सचमुच ले जाना पड़े, तो हम क्या करेंगे, उस समय हमने उन्हें यही उत्तर दिया था। चार तारीखके सवेरे हम टुकड़ीके उन दो विभागोंके साथ जानेके लिए बाँट दिये गये जिन्हें दो अलग-अलग हिस्सों में काम करना था । हमें अभी भी बिना किसी वास्तविक बचावके कूच करना था । परिस्थितियाँ जैसी थीं, उनमें यह अनिवार्य भी था । फिर भी एक दलको अपेक्षाकृत कम कष्ट हुआ। एक दिन पहले उन्हें शायद २५ मीलसे कम नहीं चलना पड़ा था । ४ तारीखको उन्हें १२ मीलसे अधिक नहीं चलना पड़ा । किन्तु सार्जेंट शेलतके अधीनस्थ दूसरे दलका वह दिन भी वैसा ही कठिन गुजरा। फलस्वरूप हममेंसे अधिक- तर लोगोंके पाँवमें छाले आ गये और पाँच तारीखको हम जैसे-तैसे मामूली तक, जो १५ मील दूर था, चल सके। टुकड़ीने इस आशासे कि घास के मैदान में एक ही रात काटनी है, दो दिनोंकी रसद साथ रखी थी, इसलिए वास्तवमें दलके सभी लोग लगभग भूखों मरनेकी हालतमें आ गये थे । फलतः हम सब लोगोंको मापूमूलो वापस जाना पड़ा ।

थके-माँदे और पैरोंमें छाले'

मापूमूलो पहुँचकर हमने एक दिन आराम पा सकनेकी आशा की थी, किन्तु वहाँ पहुँचनेपर जब दूसरे ही दिन हमें ग्रिग्स पोस्ट कूच करने और अपने डेरे खुद वहाँ ले जानेका हुक्म मिला, तो