इसके अलावा उसका यह भी उद्देश्य था कि नेटाल नागरिक सेनाके एक स्थायी अंगके रूपमें भार- तीयोंका उपयोग करनेके लिए सरकारको राजी किया जाये। मैं मानता हूँ कि मेरे देशवासी आहत- सहायता तथा अस्पताली कार्यके सर्वथा योग्य हैं। घुड़सवार फोर्डरको हम ओटीमाटीसे लाये थे । उन्हें लानेके अतिरिक्त, उनकी सेवा-शुश्रूषा भी हमें ही करनी पड़ी थी; और वे हमसे इतने सन्तुष्ट हुए थे कि स्वस्थ होनेपर इन आदमियोंके कार्यकी प्रशंसा करनेके लिए वे मुझे खोजकर मेरे पास आये ।
दलमें कुछ अंग्रेजी पढ़े लिखे कर्तव्य-कुशल भारतीय थे। मजदूर श्रेणीके भारतीय भी थे । पर सब होशियार थे और भारतीय समाज उन्हें जो कुछ दे रहा था उससे नागरिक जीवनमें कहीं अधिक कमाने योग्य थे। चूंकि समाज इस बातके लिए उत्सुक था कि उसकी सेवाएँ स्वीकार की जायें और कोई कठिनाई पैदा न हो, इसलिए लोगोंको राजी किया गया कि वे १ शिलिंग ६ पेंस दैनिक लेकर काम करना स्वीकार कर लें, और इसे उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया । किन्तु मेरी सम्मतिमें एक पौंड प्रति सप्ताहसे कमपर होशियार आदमियोंको प्राप्त करना सम्भव नहीं है ।
मैं यह भी मानता हूँ कि डोली वाहक टोलियोंके नायक माने जानेवाले लोगोंको ५ शिलिंग प्रतिदिन मिलना चाहिए ।
दलके सब लोग अप्रशिक्षित और बिना जाँचे-परखे थे। किन्तु उन्हें भी जिम्मेदारीभरा स्वतन्त्र काम दिया गया और अपनी निःशस्त्र स्थितिमें ही उन्होंने खतरेका सामना किया। अगर सरकार एक स्थायी आहत सहायक दल बनाना चाहे तो मेरी सम्मतिमें उसके लिए विशेष प्रशिक्षण बिलकुल आवश्यक है और आत्मरक्षाके हित दलके सब सदस्योंको सशस्त्र भी किया जाना चाहिए।
मेरा भारतीय समाजसे पिछले तेरह वर्षोंसे घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है और उसी हैसियतसे मैंने ये बातें आपके विचारार्थ पेश करनेका साहस किया है।
[ आपका विश्वासपात्र, ]
मो० क० गांधी
इंडियन ओपिनियन, ११-८-१९०६