सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४२५

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

४०२. गुप्त न्याय

हमारे जोहानिसबर्गके संवाददाताने पिछले सप्ताह हमारा ध्यान विशेष रूपसे इस बातकी ओर खींचा था कि एशियाइयोंके विषयमें अनुमतिपत्र विभागने जो काम किया है, उसका श्री लवडेने समर्थन[]किया है और समुद्र तटपर एक निरीक्षण अधिकारीकी नियुक्तिपर अपनी स्वीकृति दे दी है। जाहिरा तौरपर जितना दिखाई पड़ता है उससे कहीं ज्यादा घटनाके पीछे छिपा हुआ है । जनताको इस तथ्यका बिलकुल ज्ञान नहीं है कि कुछ ऐसे सलाहकार मण्डल भी हैं जो लगभग गुप्त हैं और जो एशियाई पंजीयन अधिकारी (रजिस्ट्रार ऑफ एशियाटिक्स) के, जिसके द्वारा अनुमतिपत्र जारी होते हैं, कार्यपर नियन्त्रण रखते हैं । इसलिए नाममात्रके लिए अनुमतिपत्र जारी करनेका जिम्मेदार अधिकारी यद्यपि पंजीयक ही है, फिर भी वास्तवमें वह इन परामर्श- निकायोंकी कठपुतली है और इनके आदेशोंका पालन यन्त्रवत् किया करता है। स्पष्टतः श्री लवडे इन मण्डलोंके प्रधान हैं, यद्यपि सरकारने सार्वजनिक तौरपर उनकी नियुक्ति नहीं की है। यही कारण है कि ब्रिटिश भारतीयोंके रास्तेमें, जिन्हें ट्रान्सवालमें पुनः प्रवेश करनेका वैध अधिकार है, असंख्य कठिनाइयाँ खड़ी की जा रही हैं।

यदि शरणार्थियोंके आवेदनपत्रोंके विषयमें बहुत अधिक सख्ती बरती जाती है तो इसपर हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन हमें सख्त आपत्ति है उस गोपनीयतासे जो इन परामर्श-निकायोंकी कार्रवाइयोंको छिपाये रहती है। हमें ज्ञात नहीं कि जिन दलोंका इन मामलोंसे प्रत्यक्ष सम्बन्ध है उनकी बातें मण्डलोंमें सुनी गई हैं या नहीं, या उन्हें पेश करनेका मौका दिया गया है या नहीं। यह तो केवल निकाय ही जानते हैं कि वे कैसी गवाही लेते हैं और बस्ती में ब्रिटिश भारतीयोंके पुनः प्रवेश पानेके दावोंको सिद्ध करनेके लिए किन प्रमाणोंको काफी मानते हैं । आज-जैसी व्यवस्थामें तो, बिलकुल अनजानमें ही क्यों न हो, पक्षपात होना सम्भव है। जो दावे आसानीसे साबित किये जा सकते हैं, किन्तु जिन्हें अस्वीकार कर दिया गया है, उनके बारेमें हमारे पास चारों ओरसे कड़ी शिकायतें आ रही हैं। ये निकाय, जिन्हें ब्रिटिश भारतीय शरणार्थियोंके आवेदनपत्रोंका मनमाने ढंगसे निर्णय करनेका अधिकार दिया गया है, नन्हें-नन्हें बच्चोंको बस्ती से बाहर रखते हैं ।

ऐलानिया प्रतिपक्षियोंको उनके विरोधियों या उन लोगोंके न्यायका काम सौंपना, जिनकी वे आज तक अथक निन्दा करते आये हैं, न्याय करनेका एक विचित्र तरीका है। ब्रिटिश भारतीयोंके प्रति ट्रान्सवाल शासनका कमसे कम इतना फर्ज तो है ही कि वह उन्हें निश्चित रूपसे उनकी स्थिति बता दे । ब्रिटिश भारतीय अनुमतिपत्रोंके सम्बन्धमें लुक-छिपकर जो जाँच की जाती है, उससे तो कार्य विधिके सुपरिभाषित एवं ठीक तरहसे समझे-बूझे कठोरतम नियम कहीं ज्यादा अच्छे हैं। आज तो कोई भी भारतीय इस बात में अपनेको सुरक्षित नहीं समझ सकता कि अपने पूर्व निवासका प्रमाणपत्र पेश करनेके बाद वह बिना किसी कठिनाईके ट्रान्सवालमें पुनः प्रवेश पा सकेगा । अभागे ब्रिटिश भारतीय शरणार्थियोंके लिए ट्रान्सवाल शासनने जो स्थिति पैदा कर रखी है वह अत्यन्त असन्तोषजनक और अतीव असम्मानप्रद है । वह तो नेटाल या केप बस्तीसे भी बहुत आगे बढ़ गई है जहाँ प्रवासियोंके आव्रजन के सम्बन्ध में चाहे जैसे प्रतिबन्ध क्यों न हों, हर व्यक्ति


  1. १. यह “ जोहानिसबर्ग टिप्पणियाँ " इंडियन ओपिनियन, २८-७-१९०६ में था ।