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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४३३

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पत्र : " रैंड डेली मेल " को

मेरे नम्र विचारसे भारत-मन्त्री तथा उपनिवेश-मन्त्रीसे व्यक्तिगत मुलाकात जरूरी है।


आपका सच्चा,
मो० क० गांधी

[ पुनश्च : ]

मेरे पास अखबारोंकी कतरनें नहीं बची हैं। आज बैंकोंकी छुट्टीका दिन होनेसे में मँगा भी नहीं सकता ।[]

मो० क० गां०

गांधीजी के हस्ताक्षरयुक्त टाइप की हुई मूल अंग्रेजी प्रतिकी फोटो नकल (जी० एन० २२७५) से ।

 

४०८. पत्र : “रैंड डेली मेल " को[]

[ जोहानिसबर्ग
अगस्त ९, १९०६ के पूर्व ]

[ सेवामें

सम्पादक

'रैंड डेली मेल' ]
महोदय,

श्री डंकनने अपने असाधारण वक्तव्यमें मैं तो उसे असाधारण ही कहूँगा -- जिस एशियाई विधेयककी पूर्व सूचना दी है, उसके सम्बन्धमें आपके अग्रलेखपर मैं अपने कुछ विचार प्रकट करना चाहता हूँ । मुझे भरोसा है, आप इसकी अनुमति देंगे। अपने संक्षिप्त वक्तव्यमें उन्होंने अपने श्रोताओंसे तीन बार कहा कि सरकार अधिवासी एशियाई प्रजाके साथ " उचित और न्याय्य व्यवहार" करना चाहती है और इसी कारण जिस विधेयकका उन्होंने जिक्र किया है वह विधान परिषदके अगले सत्रमें पेश किया जानेवाला है ।

आपका खयाल है कि जो अध्यादेश पास होनेवाला है उससे अधिवासी एशियाई प्रजाके साथ उदार व्यवहार होगा ।

प्रस्तावित विधेयकमें, मुझे भय है, उदारता नाम मात्रको नहीं है । उलटे, वह “उचित और न्याय्य व्यवहार" की मर्यादासे भी बहुत दूर रह जायेगा । पुनः पंजीयन तो, निश्चय ही, ऐसे व्यवहारका अंग नहीं है; और वह बिलकुल निरर्थक है। जो भारतीय बस्तीमें प्रवेश कर चुके हैं; अधिकांशतः उनमेंसे प्रत्येकका दुबारा पंजीयन हो ही चुका है। दरअसल, दूसरा पंजीयन तो अनुमतिपत्र विभागको दी गई एक सहूलियत थी, जिसे उस समय खूब पसन्द किया गया था। एशियाइयोंके धोखा देकर बस्तीमें प्रवेश करनेकी कथित बुराईका तीसरा पंजीयन कोई इलाज नहीं है। अधिवासी एशियाई प्रजाके वर्तमान पंजीयन प्रमाणपत्रोंकी जाँच करना और जिनके पास न हो उनपर मुकदमे चलाना काफी आसान है। सबके सब लोग धोखा-धड़ीसे घुस आये हैं, इस आरोपका ब्रिटिश भारतीय संघने प्रतिवाद किया है। कानून चाहे जितनी सख्ती से बनाये जायें और उनपर अमल चाहे कितनी अच्छी तरहसे क्यों न किया जाये कुछ ऐसे व्यक्ति सदा ही रहेंगे

  1. १. यह गांधीजीके स्वाक्षरोंमें है ।
  2. २. यह ता० ११-८-१९०६ के इंडियन ओपिनियनमें पुनः प्रकाशित किया गया था ।