सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४३७

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४०१
" उचित और न्याय्य व्यवहार

इससे और आगे बढ़कर सभी भारतीयोंका पंजीयन करना चाहती थी, फिर चाहे वे बच्चे हों, पत्नियाँ हों, और व्यापार करना चाहते हों या न चाहते हों । सर्वोच्च न्यायालयने सरकारकी इस कोशिशको सफल न होने दिया। तो क्या इस बिनापर कानूनको अस्पष्ट और अनिश्चित कहा जायेगा ? किसी भी निष्पक्ष व्यक्तिसे इसका उत्तर " कदापि नहीं " ही प्राप्त होगा । यह सिर्फ उन्हीं के लिए अस्पष्ट है जो भारतीयोंपर ऐसी निर्योग्यताएँ थोपना चाहते हैं, जिनका स्वर्गीय राष्ट्रपति क्रूगर तथा उनकी सरकारने कभी सपने में भी खयाल नहीं किया था ।

तीसरी रियायत धार्मिक कार्योंके लिए सुरक्षित भूमिके बारेमें है। विटवॉटर्सरैंड उच्च न्यायालयने फैसला किया है कि कोई भी रंगदार व्यक्ति इस तरहकी जमीन रख सकता है, और तथ्यकी बात तो यह है कि ब्रिटिश भारतीयोंने ऐसी अनुमतिके लिए अब सरकारको परेशान करना भी छोड़ दिया है, और वे ट्रान्सवालमें भारतीय न्यासियोंके नामसे मसजिदकी जायदादका नियमित पंजीयन करवानेवाले हैं। अतएव उनको सरकारसे कोई अधिकार या संरक्षण लेनेकी आवश्यकता नहीं है। अतः इस मामलेमें भी एशियाइयोंको किसी प्रकारकी रियायत नहीं दी जा रही है।

चौथी, निःसन्देह एक रियायत है। किन्तु एशियाई समाज जैसा है उसपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यह सिर्फ एक ही व्यक्तिको फायदा पहुँचानेके लिए है । ट्रान्सवालमें सिर्फ एक ही जायदाद १८८५ के कानून ३ के लागू होनेके पहलेसे एक भारतीयके कब्जे में है -- क्षेत्रफलमें, बागके लिए निर्धारित की गई भूमिका दो-तिहाई अंश।[] इस मामलेमें यदि रियायत की जाती है और वारिसोंको जायदादपर काबिज रहने दिया जाता है तो यह ब्रिटिश सरकारका अपने प्रजाजनके प्रति निरे कर्त्तव्यका निर्वाह मात्र माना जायेगा। ऐसे प्रस्तावको एशियाई समाजके प्रति रियायत- जैसे बड़े नामसे विभूषित करना उसकी बुद्धिका अपमान करना है।

इसलिए जहाँतक १८८५ के कानून ३ का सम्बन्ध है, श्री डंकन द्वारा प्रस्तावित ढंगसे उसका मंसूख किया जाना बिलकुल अनावश्यक है और उससे बेहिसाब कठिनाइयाँ खड़ी हो जायेंगी, जिनसे आज शायद ब्रिटिश भारतीय मुक्त हैं।

शान्ति-रक्षा अध्यादेशके विषयमें श्री डंकनने कहा कि अभ्यागतोंको अनुमतिपत्र देनेकी व्यवस्था की जायेगी । हम आदरपूर्वक कहना चाहेंगे कि यह भी निरी धोखेकी टट्टी है। अभीतक इस प्रकारके अनुमतिपत्र देनेके लिए किसी धाराकी जरूरत नहीं पाई गई। यह ठीक है कि उन्हें देनेमें सरकारने बाधाएँ खड़ी की थीं, किन्तु उससे तो उसे और भी बदनामी मिली है । अब अस्थायी अनुमतिपत्र देनेकी, जिन्हें देनेका पहलेसे सरकारको कानूनन अधिकार है, किन्तु भारतीय- विरोधी लोगोंके आन्दोलनके भयसे जिन्हें देनेसे वह अभीतक इनकार करती आई है, मीठी-मीठी बातें करके वह उस कलंकसे मुक्त नहीं हो सकती ।

इसके अतिरिक्त श्री डंकन यह भी कहते हैं कि उनके वक्तव्यमें जिस नीतिकी व्याख्या की गई है, वहीं साम्राज्य सरकारकी नीति रही है - और वही स्थानीय सरकारकी भी नीति है । यह कथन तथ्योंके अनुरूप नहीं है। क्योंकि, लॉर्ड मिलनरकी नीति तो यह थी कि उत्तरदायी शासन देनेके पहले ही एशियाई कानूनको ब्रिटिश परम्पराओंके अनुकूल बना दिया जाये और जो भारतीय शिक्षा अथवा अन्य निपुणताओंके कारण योग्य हों, उन्हें ट्रान्सवालमें सम्राटकी अन्य प्रजाओंके समान बराबरीका स्थान दिया जाये। श्री लिटिलटनके खरीतेमें भी इस प्रकारकी नीतिका निर्देश किया गया था । इसलिए श्री डंकनका वक्तव्य स्पष्ट ही उस इरादेसे पीछे जाने- वाला है जो लॉर्ड मिलनर या, बादमें, श्री लिटिलटनने व्यक्त किया था ।


  1. १. १४ ३९८ पर बागके लिए निर्धारित भूमिका क्षेत्रफल दो-पंचमांश होनेका उल्लेख है ।

५- २६