४११. पत्र : दादाभाई नौरोजीको[१]
पो० ऑ० बॉक्स ९६८
जोहानिसबर्ग
अगस्त १३, १९०६
इंडियन ओपिनियन' के प्रस्तुत अंकमें[२] १८८५ के कानून ३ में श्री डंकन द्वारा प्रस्तावित संशोधनोंकी पूरी जानकारी प्रकाशित हुई है। श्री लिटिलटन तथा श्री मॉर्लेके खरीतोंके कुछ अंश तथा १८८५ के कानून ३ का सम्पूर्ण पाठ भी दिया गया है ।
यह तो एक नजरसे ही स्पष्ट हो जायेगा कि श्री डंकन अपने प्रस्तावित संशोधनसे खरीतोंकी व्याप्तिको बहुत ज्यादा सीमित कर रहे हैं। पुनः पंजीयनके बारेमें श्री लिटिलटन और लॉर्ड मिलनरने कोई जिक्र तक नहीं किया है; और उन दोनोंनें यह व्यक्त किया है कि, कमसे कम, उच्चतर श्रेणीके भारतीयोंको तो पूरे अधिकार मिलने ही चाहिए। इससे श्री डंकनका यह कहना कि वे साम्राज्य सरकारके इरादोंको कार्यरूप दे रहे हैं, वस्तुस्थितिसे दूर हो जाता है। हाँ, अगर उदारदलीय मन्त्रिगण पूर्ण रूपसे बदल गये हों और अब उनका यह विचार हो कि ब्रिटिश भारतीयोंकी स्वतन्त्रताको अनुदार दलका मन्त्रिमण्डल जिस हद तक कम करनेको तैयार था उससे भी अधिक घटा दिया जाये तो बात दूसरी होगी ।
मेरी धारणा तो निश्चय ही यह है कि जबतक ट्रान्सवाल सम्राट्के उपनिवेश विभागके शासनतंत्र में है तबतक सम्राट्की सरकारको चाहिए कि वह न्याय - भावनापर आधारित कानून बनाये; भले ही जैसा कि लॉर्ड मिलनरने कहा है, यह “सरकारी बहुमतका उपयोग करके हो, और बादमें इसे बदलनेका भार उत्तरदायी मन्त्रिमण्डलपर-- अगर उसमें ऐसा करनेकी हिम्मत हो तो -छोड़ दिया जाये ।
आपका सच्चा,
मो० क० गांधी
मूल अंग्रेजी पत्रकी फोटो नकल (जी० एन० २२७६ ) से ।