४१२. प्रार्थनापत्र : लॉर्ड एलगिनको
डर्बन,
अगस्त १३, १९०६[१]
परमश्रेष्ठ, परममाननीय लॉर्ड एलगिन, पी० सी०, आदि
लन्दन, इंग्लैंड
आपके प्रार्थी परमश्रेष्ठका ध्यान नेटाल संसद द्वारा अभी हालमें पास किये गये नगर- निगम संघटन विधेयककी ओर आकर्षित करते हैं । आपके प्रार्थियोंने कृतज्ञतापूर्वक इस बातको लक्ष्य किया है कि इस विधेयकके विषयमें भारतीय समाजने जो आपत्तियाँ उठाई थीं उनमेंसे कुछको परमश्रेष्ठने अपने खरीतेमें मान लिया है ।
फिर भी आपके प्रार्थियोंको दुःख है कि विधेयकके विरुद्ध उठाई गई एक आपत्तिपर परमश्रेष्ठने विचार नहीं किया है और वह है नगरपालिकाके चुनावोंमें मतदाताओंके रूपमें ब्रिटिश भारतीयोंका मताधिकार छीननेका प्रस्ताव ।
जब नेटाल संसदमें यह विधेयक विचाराधीन था, तब भारतीय समाजने विधेयकके बारेमें अपनी आपत्तियाँ प्रकट करते हुए एक प्रार्थनापत्र दिया था। उसकी एक प्रति परमश्रेष्ठकी जानकारीके लिए यहाँ नत्थी है ।[२]
नेटाल निवासी ब्रिटिश भारतीय अनुभव करते हैं कि यदि उन्हें नगरपालिका-मताधिकारसे वंचित कर दिया गया तो यह एक बड़ी गम्भीर शिकायत होगी और नेटालके जिम्मेदार राज- नीतिज्ञों द्वारा की गई उन घोषणाओंके प्रतिकूल होगी जो भारतीयोंको संसदके मताधिकारसे वंचित करते समय की गई थीं। उस समय यह बात मान ली गई थी कि यद्यपि भारतमें संसदीय संस्थाएँ नहीं हैं तथापि नगरपालिकाएँ तो अवश्य हैं, और भारतमें नगरपालिकाओंके हजारों मतदाता हैं।
प्रस्तावित मताधिकारके अपहरणके पक्षमें कोई वैध तर्क नहीं दिया गया है। भारतीय नेटाल उपनिवेशमें कोई राजनीतिक सत्ता पानेकी आकांक्षा नहीं रखते । किन्तु वे अन्य कर- दाताओंके बराबर ही कर देते हैं; इसपर भी जब उनकी नगरपालिका सम्बन्धी स्वतन्त्रतामें हस्तक्षेप किया जाता है तब वे, स्वभावतः, नापसन्द करते हैं ।
प्रायः यह कहा जाता है कि नेटालकी भारतीय आबादी, सामान्यतः, केवल गिरमिटिया वर्ग की है। सादर निवेदन है कि ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस समय नेटालमें ऐसे
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