जोहानिसबगेकी चिट्ठी ४०७ बोलनेवाले भारतीय हैं तो बहुत, फिर भी इनमेंसे किसी एकके सारे भारतमें फैलनेकी बहुत कम सम्भावना है। बाकी बच गई हिन्दी भाषा । यह भाषा उत्तर भारतमें सब लोग बोलते हैं । उसकी माता संस्कृत और फारसी होनेके कारण वह हिन्दू और मुसलमान दोनोंको अनुकूल पड़ सकती है। इसके सिवा, चूँकि फकीर और संन्यासी यही भाषा बोलते हैं इसलिए इसका प्रसार सब जगह होता है । अनेक अंग्रेज भी इसे सीखते हैं । इस भाषाका फैलाव बहुत है । भाषा अपने आपमें बहुत मीठी, नम्र और ओजस्वी है। इसमें बहुत सी पुस्तकें लिखी गई हैं और अब भी लिखी जा रही हैं । इसलिए ' इंडियन वर्ल्ड' के सम्पादक महोदयने सुझाया है कि हरएक पाठशालामें स्वभाषाके अतिरिक्त इस भाषाका शिक्षण दिया जाना चाहिए। माता-पिताको भी चाहिए कि वे अपने बच्चोंमें बचपन से ही हिन्दी भाषा बोलनेकी आदत डालें । तभी भारत वास्तविक रूपमें एक राष्ट्र बन सकेगा ।
इंडियन ओपिनियन, १८-८-१९०६
४१५. जोहानिसबर्ग की चिट्ठी
अगस्त १८, १९०६
श्री भाभाका मुकदमा
श्री मुहम्मद सुलेमान भाभाका अनुमतिपत्र सम्बन्धी मुकदमा फोक्सरस्टमें चल रहा था । उसके बारेमें अपील की गई थी। लेकिन चूंकि वकील उस अपीलके विरुद्ध थे, इसलिए वह वापस ले ली गई है। वकीलकी सलाहसे श्री भाभाने निश्चित अवधिमें ट्रान्सवालकी हद छोड़नेसे इनकार किया था; इसलिए उनपर अदालत में फिरसे मुकदमा चला। मजिस्ट्रेटके सामने दलील पेश की गई कि उनके हुक्मके अनुसार श्री भाभाके ट्रान्सवालमें रहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उन्हें इस देशमें प्रवेश करनेका अधिकार पहलेसे है । मजिस्ट्रेटने यह दलील स्वीकार नहीं की और श्री भाभाको कमसे कम, अर्थात् एक महीनेकी साधारण कैदकी सजा सुना दी। अब श्री भाभाने फिरसे अपील की है; और ऐसी आशा की जाती है कि वे इस अपीलमें जीतेंगे ।
जमीनके बारेमें महत्त्वपूर्ण निर्णय
सर विलियम स्मिथके सामने इस हफ्ते में एक दरखास्त आई थी । उसपर उन्होंने जो निर्णय दिया वह महत्त्वपूर्ण है । यहाँके सुपरिचित सेठ मुहम्मद कासिम कमरुद्दीनने श्री चेम्बरलेनका देहान्त हो जानेसे अपनी सारी जमीन दूसरे यूरोपीयके नामपर चढ़वानी चाही । पंजीयकने ऐसा करनेसे इनकार कर दिया। तब उन्होंने अदालतसे आज्ञा माँगी। पहले तो न्यायाधीशने स्वयं ही यह आपत्तिकी कि ऐसा करनेके लिए वारिसकी सम्मति चाहिए। न्यायाधीश स्मिथके सामने यह दलील दी गई कि उस जमीनपर वारिसका कोई हक नहीं था । इस दलीलको न्यायाधीश महोदयने मान्य करके दूसरे यूरोपीयके नामपर उक्त जमीन चढ़ानेका हुक्म दे दिया। इससे यह समझा जा सकता है कि यदि पर्याप्त सावधानीसे गोरोंके नाम जमीन रखी गई हो तो असली मालिकको कोई नुकसान नहीं हो सकता ।
मलायी बस्ती
नगर-परिषदको मलायी वस्तीके बारेमें बस्ती समितिकी तरफसे अर्जी दी गई थी। उसके उत्तरमें नगर परिषदने कहा है कि मलायी बस्ती जहाँ है, वहाँ नहीं रहने दी जायेगी; वहाँके