४१८. हिन्दुओं के श्मशानकी स्थिति[१]
श्री डोघटींने हिन्दुओं के श्मशानकी स्थिति के बारेमें हमें एक पत्र लिखा है । डर्बनके हिन्दुओंका ध्यान हम उसकी ओर आकर्षित कर रहे हैं। यदि इस श्मशानकी स्थिति वैसी ही हो जैसी श्री डोघने बताई है तो हिन्दुओंके लिए यह बहुत ही लज्जा और कलंककी बात मानी जायेगी । श्मशान स्वच्छ तथा अच्छी स्थितिमें रखना हर हिन्दूका कर्तव्य है । ऐसा न करनेसे कानून और स्वास्थ्यके नियमका तो उल्लंघन होता ही है; मनुष्य जातिके नाते ऐसी बातोंके विषयमें हमें जो कोमल भावना रखनी चाहिए, उस नियमका भी उल्लंघन होता है। हमें स्मशानकी स्थितिके विषय में और भी अनेक पत्र मिले हैं। वे चुटीले हैं और उनमें हिन्दू जातिकी आलोचना की गई है, इसलिए हमने उन्हें प्रकाशित नहीं किया । किन्तु हमें हर हिन्दूसे कहना चाहिए कि और बातों में चाहे जैसे झगड़े हों, मरण-जैसी स्थिति के समय अपनी वृत्तियोंको कोमल और पवित्र रखना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक है। और यदि ऐसा न करें, तो यह हमारी बहुत बड़ी कमी मानी जायेगी, इसे प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार करेगा ।
इंडियन ओपिनियन, २५-८-१९०६
४१९. ईरानका मामला
हाल में ईरानके शाहने ऐलान किया है कि आर्थिक दिवालियेपनकी परिस्थितिसे निकलनेके लिए प्रजा परिषद बुलवाई जायेगी। ईरान इस स्थितिमें पहुँचा, इसका मुख्य कारण शाहका उड़ाऊ- पन है। इस वर्षके प्रारम्भमें प्रजा वर्तमान राज्यके विरुद्ध इतनी उत्तेजित थी कि सैकड़ों व्यापारी और मुल्ला तेहरान छोड़कर चले गये थे। इससे घबराकर शाहने मुल्लों, व्यापारियों और जमींदारोंकी चुनी हुई परिषद बुलानेका वचन दिया है; किन्तु कोषके सम्बन्धमें जो गम्भीर परिस्थिति उत्पन्न हो गई है वह शायद ही सुधरे। वर्तमान शाह मुजफ्फरुद्दीनने १० वर्षके भीतर ईरानको इस स्थितिमें ला छोड़ा है। ईरानका सारा राजस्व शाहके हाथमें है । पहले के शाहोंने थोड़ा-बहुत निजी धन जोड़ लिया था । वर्तमान शाहके पास २० लाख पौंड थे । हिसाब लगानेपर मालूम हुआ है कि निजी धन खर्च हो गया है और वार्षिक आयके १५ लाख पौंड भी खर्च हो जाते हैं । इतना ही नहीं, इसके अतिरिक्त ४० लाख पौंडका कर्ज भी हो गया है। देश दिनोदिन गरीब होता जा रहा है । करका बोझ मुख्यत: मजदूर वर्गपर है। पिछले दो-चार वर्षोंमें यूरोपके दौरों और महलकी शान-शौकतपर बहुत दौलत उड़ाई गई है। ईरानकी ऐसी खराब स्थिति हो गई है कि उसका वर्णन करते हुए जोहानिसबर्ग के 'रैंड डेली मेल' ने कहा है कि इस गम्भीर स्थितिका रूस लाभ न उठा ले, इसके लिए सावधान रहना जरूरी है। क्योंकि, भारतके पड़ोसमें रूस पाँव जमा ले तो अंग्रेज सुखसे नहीं बैठ सकेंगे ।
इंडियन ओपिनियन, २५-८-१९०६
- ↑ १. देखिए " हिन्दू श्मशान", पृष्ठ ४२६ ।