उसम सिर्फ कुलियोंकी ही बात की गई है और एशिया के सम्पूर्ण अधिवासियोंके लिए इस शब्दका प्रयोग स्थायी हो जाता है । यह परिभाषा अवास्तविक है, क्योंकि यहाँ अरब और तुर्की राज्यके मुसलमान प्रजाजन शायद ही हैं। इससे मलायी लोगोंके साथ घोर अन्याय होता है, क्योंकि १८८५ के कानून ३ के अनुसार आजतक वे कभी नहीं सताये गये हैं और न उनको कभी यह दुर्भाग्य ही प्राप्त हुआ है कि वे ब्रिटिश भारतीयोंकी भाँति व्यापारमें यूरोपीयोंके प्रतिद्वन्द्वी गिने जायें।
(ख) जब कि मसविदेसे उपनिवेशवासी प्रत्येक एशियाईको असंख्य परेशानियाँ होती हैं, उससे ट्रान्सवालके युद्धसे पहलेके निवासियोंकी, जो अभीतक उपनिवेशमें नहीं लौटे हैं, स्थिति पहलेकी भाँति ही अनिश्चित, अस्पष्ट और दुःखजनक बनी रहती है ।
(ग) उसमें कप्तान हैमिल्टन फाउलके मेहनतसे किये गये पंजीकरणका भी ध्यान नहीं रखा गया है । यहाँ इसका उल्लेख किया जा सकता है कि कप्तान फाउलने पंजीकरणका जो कार्य किया था, उसकी व्यवस्था भारतीय समाजकी सलाहसे की गई थी। भारतीयोंने लॉर्ड मिलनरकी सम्मतिको नम्रता एवं शिष्टतासे मानकर पंजीकरण मंजूर कर लिया था, यद्यपि, जैसा कि स्वीकार किया गया था, जो लोग पिछली सरकारको तीन पौंड [ कर ] दे चुके थे उनके सम्बन्धमें इसके पीछे कोई कानूनी बल नहीं था । इसकी और समाजके अन्य स्वेच्छापूर्वक किये गये कार्योंकी अध्यादेशके मसविदेमें चर्चा भी नहीं है ।
(घ) धारा ३ में जान-बूझकर उन सुविधाओंको भी कम कर दिया गया है, जो शान्ति- रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत भारतीय समाजको प्राप्त थीं। जैसा कि सरकार अच्छी तरह जानती है, इस आशयका एक अदालती फैसला मौजूद है कि जिस ब्रिटिश भारतीयके पास पंजीकरणका पुराना डच प्रमाणपत्र है उसको नया अनुमतिपत्र लिये बिना उपनिवेशमें प्रवेश करनेका अधिकार है । धारा ३ की उपधारा २ से यह फैसला रद हो जाता है ।
(ङ) जब कि १८८५ के कानून ३ के अन्तर्गत और सर्वोच्च न्यायालयके हालके फैसलेके अनुसार ट्रान्सवालमें व्यापारके उद्देश्यसे बसने के इच्छुक बालिग मर्दोंको ही पंजीकरण कराना आवश्यक है, वर्तमान अध्यादेशसे ८ सालसे ऊपरका प्रत्येक भारतीय स्त्री-पुरुष पंजीकरण के लिए बाध्य होगा । यदि मेरे संघकी आशंका ठीक है तो यह कानून नारीकी शालीनतापर, उसका जो अर्थ मेरे लाखों देशवासी समझते हैं उस अर्थ में, आघात करनेवाला होगा। मेरा संघ जिस समुदायका प्रतिनिधित्व करता है उसकी युगोंसे प्रेमपूर्वक पोषित भावनाएँ बुरी तरह कुचल जायेंगी। यदि पंजीकरण कानूनपर अमल किया गया तो इसका यही अर्थ होगा कि सम्राट्की सरकारने प्रत्येक भारतीयको अपराधी घोषित कर दिया है । जहाँतक मेरे संघकी जानकारी है, ब्रिटिश उपनिवेशोंमें मुक्त भारतीय आबादीके सम्बन्धमें इस प्रकारका कानून अज्ञात है ।
(च) तीन पौंडी शुल्ककी माफी तो, मेरे संघकी नम्र सम्मतिमें, जलेपर नमक छिड़कनेके समान है; क्योंकि उपनिवेशमें इस समय रहनेवाले प्रायः सभी एशियाई पंजीकृत हैं और कई तो ३ पौंडी कर दो-दो बार दे चुके हैं।
(छ) धारा १७ की उपधारा ४ में लेफ्टिनेन्ट गवर्नरको अधिकार दिया गया है कि वह अस्थायी अनुमतिपत्र प्राप्त किसी ब्रिटिश भारतीयको मद्य परवाना अध्यादेशकी शर्तोंसे मुक्त कर सकता है। यह जलेपर नमक छिड़कनेकी दूसरी मिसाल है। मेरे संघको ऐसे किसी स्वाभिमानी भारतीयका पता नहीं है जो ऐसी महँगी छूट चाहता हो ।
प्रस्तावित अध्यादेशमें आपत्तियोग्य और भी अनेक बातें गिनाई जा सकती हैं; परन्त मेरे सघका विश्वास है कि ऊपर यह दिखाने के लिए काफी लिखा जा चुका है कि ब्रिटिश भारतीयोंके लिए इस अध्यादेशका क्या मतलब है ।