सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४५८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

४३१. अपराध

ट्रान्सवाल सरकारके एशियाई अध्यादेशके मसविदेको हम पहले ही 'घृणित' बता चुके हैं।[] इस अध्यादेशको और उसके बारेमें प्राप्त शिकायतोंकी ज्यादा गहरी जाँचके बाद यह आवश्यक है कि सरकारकी प्रस्तावित कार्रवाईको इससे भी कठोर शीर्षक दिया जाये। यदि इस अध्यादेश के सम्बन्धमें आगे कार्रवाई की जायेगी तो वह मानव-जातिके विरुद्ध अपराध होगा ।

ट्रान्सवालमें आज स्त्री- बच्चे सब मिलाकर १३,००० से अधिक भारतीय नहीं हैं। स्त्रियों- बच्चोंके पास कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिससे उनको देशमें प्रवेश करनेका अधिकार दिया गया हो, क्योंकि अनुमतिपत्र सम्बन्धी नियमोंके अनुसार उन्हें ऐसे दस्तावेजोंकी आवश्यकता नहीं है । परन्तु अध्यादेशमें अनुमतिपत्रकी जो परिभाषा की गई है उसके अनुसार वे ट्रान्सवालके वैध निवासी नहीं हैं। तब क्या वे उपनिवेशसे निर्वासित कर दिये जायेंगे, क्या स्त्रियोंको उनके पतियोंसे और बच्चोंको उनके माता-पिताओंसे अलग कर दिया जायेगा ? कदाचित् ऐसा न होगा । फिर भी अध्यादेश प्रशासन विभागको स्त्री-बच्चोंके अपमानका, और निर्वासनका भी, अधिकार सौंप दिया गया है। यह पुराना अनुभव है कि निरंकुश सत्ता अच्छे-अच्छे लोगोंके भी हाथोंमें जानेपर उनके मानव-स्वभावके स्तरको गिराती है, और अक्सर, उनके न चाहते हुए भी, उन्हें ऐसे कार्य करनेको बाध्य करती है जिनको वे इससे भी ज्यादा उत्तरदायित्वकी अन्य परि- स्थितियोंमें कदापि न करते । ईसाई धर्म-प्रवक्ताने, हमारे खयालसे जिसके धार्मिक सिद्धान्तोंका अनुगमन करनेका दम ट्रान्सवाल सरकार भरती है, जब प्रलोभनकी निन्दा की थी तब उन्होंने एक साधारण सत्य ही प्रकट किया था ।

बात यहीं खतम नहीं होती । अध्यादेशका परिणाम यह होगा कि अध्यादेशसे पहले जारी किया गया प्रत्येक अनुमतिपत्र और पंजीकरणका प्रमाणपत्र व्यर्थ हो जायेगा - अर्थात् जिनके पास ये कागज होंगे उनमेंसे प्रत्येकको एशियाई पंजीकरण अधिकारीके सामने जाना और उसको सन्तुष्ट करना होगा कि वह ही उसका कानूनसम्मत मालिक है। ट्रान्सवालके भारतीय जानते हैं कि इसका अर्थ क्या है; उनसे सब प्रकारके अनावश्यक और प्रायः अपमानजनक सवाल पूछे जायेंगे और तीसरा प्रमाणपत्र मिलने के पूर्व उनको एक कड़ी परीक्षासे गुजरना होगा । और यह सब किसलिए ? इसीलिए कि कुछ भारतीय, जिनकी नैतिक भावनाएँ सरकारी गलतियों एवं अनावश्यक सख्तियोंसे कुंठित हो चुकी हैं, ट्रान्सवाल उपनिवेशमें अधिकारके बिना प्रविष्ट हो गये हैं ।

इस अध्यादेशको जारी करनेका एकमात्र प्रकट कारण उस निराशाजनक अयोग्यतापर

परदा डालना है, जिससे वर्तमान कानूनोंका प्रशासन किया जाता है। अन्यथा हमारी मान्यता है कि वर्तमान कानून धोखे-घड़ीसे प्रवेशके सब मामलोंसे निपटनेके लिए काफी है । 'शान्ति-रक्षा अध्यादेश' में एक धारा है जिसके अन्तर्गत नियुक्त अधिकारियोंको अनुमतिपत्रोंके निरीक्षणका अधिकार प्राप्त है । यदि कोई अनुमतिपत्र नहीं पेश कर सकता है तो उसको गिरफ्तार और अन्तत: उपनिवेशसे निर्वासित किया जा सकता है । जो लोग उपनिवेशसे न निकलेंगे उनके लिए बहुत कठोर दण्डका विधान है। हमारी मान्यता है कि यदि इन धाराओंपर विवेकपूर्वक अमल किया

 
  1. १. देखिए "घृणित !", पृष्ठ ४१४ |