४३३. रूस और भारत
श्री ईसप मियाँने ट्रान्सवालके अंग्रेजी राज्यकी स्थितिका रूसकी स्थितिके साथ मिलान किया है ।[१] यह तुलना करने लायक है। जिस तरह रूसमें लोगोंपर राज्याधिकारी जुल्म करते हैं, उसी तरह ट्रान्सवालमें भारतीय प्रजापर राज्याधिकारी जुल्म करते हैं। रूसमें लोगोंके खून होते हैं व लोगोंपर खुलेआम हमला होता है। ब्रिटिश राज्यमें लोगोंके दुःख यद्यपि चूहेके काटनेकी तरह तत्काल जाहिर नहीं होते, फिर भी परिणाम वैसे ही खराब कहे जा सकते हैं, जैसे रूसमें ।
रूसी लोग अपनेपर होनेवाले जुल्मोंका प्रतिकार कैसे करते हैं और हम कैसे करते हैं, यह जानने योग्य है । अंग्रेजी राज्यमें हम लोग अर्जियाँ लिखते हैं, समाचारपत्रोंमें लिखकर आन्दोलन करते हैं, राजवंशियोंसे न्याय प्राप्त करते हैं। यह सब ठीक है और करना भी चाहिए। इससे कुछ फायदा भी होता है। इससे अधिक हमें और भी कुछ करना चाहिए, क्या हम यह बता सकते हैं ? इस प्रश्नके उत्तरके बारेमें हम बादमें सोचेंगे। फिलहाल तो रूस क्या करता है, यह देखना है। वहाँके धनी-गरीब सिर्फ अर्जियाँ लिखकर ही नहीं बैठे रहते। उनके दुःख ऐसे हैं कि उनके कारण वहाँ अराजकतावादी काफी संख्यामें उत्पन्न हो गये हैं । उनकी यह मान्यता है कि राज्य करनेवाले सब अत्याचारी होते हैं, इसलिए राज्यसत्ताको नष्ट कर देना चाहिए । इसके लिए रूसके लोग छिपी और खुली रीतिसे राज्याधिकारियोंकी हत्या कर डालते हैं । ऐसा करना उनकी भूल है । और इस तरह बिना विचारेकी गई उग्र प्रवृत्तियोंके कारण वहाँ राजा और प्रजा दोनोंके मनमें निरन्तर अशान्ति बनी रहती है। किन्तु ऐसा साहस करनेवाले स्वयं बड़े बहादुर और देशभक्त होते हैं, यह तो सभी कबूल करते हैं।
छोटी उम्र की लड़कियाँ भी ऐसा साहस करती हैं । अभी-अभी एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। उसमें जो बालाएँ अमर हो गई हैं उनके जीवन-चरित्र दिये गये हैं। ऐसी लड़कियाँ, मरना तो है ही, ऐसा समझकर मरनेकी तैयारी करती हैं और अपने मनमें देशभक्ति रखकर सम्पूर्ण बलिदानका संकल्प करके, जिसे देशका शत्रु मानती हैं उसकी हत्या कर डालती हैं; और बादमें यातनाएँ भोगती हुई अधिकारियोंके हाथों मृत्यु प्राप्त करती हैं। वे ऐसी जोखिम उठाकर देशकी सेवा करती हैं। इसमें उनका तनिक-सा भी स्वार्थ नहीं रहता । वह देश अत्याचारसे मुक्ति पायेगा इसमें आश्चर्य नहीं। वह तत्काल ही मुक्त नहीं हुआ, इसका केवल यही कारण है कि, जैसा हमने ऊपर बताया है, स्वदेशाभिमान गलत मार्गपर भटककर खूंरेजीपर उतर आया है । ईश्वरीय नियमके अनुसार विचार करें तो, इससे लोगोंको तुरन्त लाभ नहीं मिल सकता ।
क्या हम इतने स्वदेशाभिमानका परिचय देते हैं ? हमें दुःखके साथ कहना पड़ता है नहीं। इसमें किसीको दोष नहीं दिया जा सकता। अभी हमने वैसा करनेकी शिक्षा नहीं ली । राजनीतिके मैदान में अभी हम बच्चे हैं। जनताका सुख ही हमारा सुख है, इस नियमको हम कम समझते हैं । किन्तु अब हमारे सामने उस स्थिति से निकल जानेका समय आ गया है। हमें खूँरेजी करनेकी जरूरत नहीं है। हमारे लिए प्राणघातक साहस करनेकी जरूरत नहीं रही । किन्तु अपने शरीरको कष्ट देनेकी जरूरत है। उसका सर्वोत्तम उदाहरण ट्रान्सवालका नया कायदा है । यह कायदा अत्याचारकी हद जाहिर करता है। इस कायदेके बनानेवालोंको सजा
- ↑ १. देखिए इंडियन ओपिनियन, ८-९-१९०६ ।