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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४६६

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४४१. सार्वजनिक सभा

ब्रिटिश भारतीयोंकी एक सार्वजनिक सभा एशियाई अधिनियम संशोधन अध्यादेशके मसविदेके विरुद्ध आपत्ति प्रकट करनेके लिए बुलाई गई थी। इसकी अध्यक्षता ब्रिटिश भारतीय संघके अध्यक्ष श्री अब्दुल गनीने की थी । अध्यादेश के खिलाफ कई लोग बोले और उन्होंने उसके कानून बन जानेकी अवस्थामें उसकी अवज्ञा करनेकी अपील की । गांधीजीके भाषणकी रिपोर्ट नीचे दी जाती है :

जोहानिसबर्ग
सितम्बर ११, १९०६

बादमें ब्रिटिश भारतीय संघके अवैतनिक मन्त्री श्री मो० क० गांधी (जोहानिसबर्ग) ने सभामे भाषण दिया। उन्होंने बताया कि कुछ आलोचकोंका खयाल हो सकता है कि हमारे प्रस्तावों में जिस तर्क-श्रृंखलाकी रूपरेखा व्यक्त हुई है, उसमें दोष है, क्योंकि हमने अपनी शिकायतें दूर करने की माँग की है और बादमें एकदम यह धमकी दी है कि यदि हमारी प्रार्थना मंजूर नहीं की गई तो हम जेल जायेंगे । किन्तु श्री गांधीने दावा किया कि उक्त तर्क-श्रृंखलामें कोई वास्तविक दोष नहीं है, क्योंकि हम धमकी नहीं दे रहे हैं । यह तो सिर्फ थोड़े-से अमलकी बात है, जिसका मूल्य बहुत-से भाषणों और लेखोंके बराबर होता है। उन्होंने कहा कि, मैंने इस मामलेपर पहले गम्भीरता और आन्तरिकतासे विचार किया है, और तब हमें जो कदम उठाना चाहिए उसके सम्बन्धमें अपनी राय दी है। मैं अनुभव करता हूँ कि यदि हमारी प्रार्थना स्वीकार नहीं की जाती तो जो रास्ता तय किया गया है उसे स्वीकार करनेको हम बद्ध कर्तव्य हैं। श्री गांधीने दावा किया कि उस दिन जिन विशेषणोंका प्रयोग किया गया था उनमेंसे हरएक उस अवसरपर सार्थक था । यदि मुझको कोई और भी कठोर विशेषण मिला होता तो मैं उसका प्रयोग करता । मैंने दक्षिण आफ्रिकाके समस्त एशियाई-विरोधी कानूनोंका अध्ययन किया है; किन्तु मैंने अपने अबतक के पूरे अनुभवमें प्रस्तुत अध्यादेशके समान कोई कानून नहीं देखा। ऑरेंज रिवर कालोनीका अध्यादेश कड़ा है; किन्तु वह भी इस कानूनसे, जो यहाँ अब पेश किया गया है, ज्यादा अच्छा है । यह तो इतना बुरा है कि कोई भी स्वाभिमानी भारतीय इसके अधीन रह ही नहीं सकता। मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने जो गम्भीर कदम उठाया है उसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर है और मैं पूरी जिम्मेदारी ग्रहण करता हूँ । मैं महसूस करता हूँ कि मैंने भारतीयोंको वफादार ब्रिटिश प्रजाके रूपमें यह कदम उठानेकी सलाह देकर उचित ही किया है। इस सम्बन्ध में हमारी सब कार्रवाइयाँ वफादारीसे पूर्ण हैं । हमपर अराजभक्तिकी छाया भी नहीं ठहर सकती। कुछ लोग कह सकते हैं कि हम मूर्ख हैं, और यदि अपने देशभाइयोंपर मेरा पूर्ण विश्वास न होता तो मैं खुद कहता कि हमारी कार्रवाई मूर्खतापूर्ण है। किन्तु मैं अपने देशभाइयोंको जानता हूँ; मैं जानता हूँ कि मैं उनपर विश्वास कर सकता हूँ और मैं यह भी जानता हूँ कि जब कोई बहादुरीका कदम उठानेका मौका आयेगा, तब उनमें से प्रत्येक व्यक्ति वह कदम उठायेगा ।

[ अंग्रेजीसे ]
इंडियन ओपिनियन, २२-९-१९०६