सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४६९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४३३
सार्वजनिक सभा

न करे कि एक या अनेक व्यक्ति अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दें, तो दूसरे सहज ही बन्धन-मुक्त हो सकते हैं। हरएक अपनी-अपनी जिम्मेदारीको पूरी तरहसे समझकर स्वतन्त्ररूपसे प्रतिज्ञा करे, और यह समझकर करे कि दूसरे कुछ भी करें, मैं खुद तो मरते दम तक उसका पालन करूँगा ही ।

[ गुजरातीसे ]

मो० क० गांधी : दक्षिण आफ्रिकाना सत्याग्रह्नो इतिहास, अध्याय १२; नवजीवन प्रकाशन- मन्दिर, अहमदाबाद

सभामें स्वीकृत प्रस्ताव[]

ब्रिटिश भारतीयोंकी यहाँ समवेत यह सार्वजनिक सभा सम्मानपूर्वक ट्रान्सवालकी विधान- परिषदके माननीय अध्यक्ष और सदस्योंसे अनुरोध करती है कि वे मसविदारूप एशियाई अध्यादेशको, जो १८८५ के कानून ३ में संशोधन करने के लिए रखा गया है और अब सम्मान्य सदनके सम्मुख प्रस्तुत है, इन बातोंको देखते हुए मंजूर न करें:

प्रस्ताव १

(१) जहाँतक ट्रान्सवालके भारतीय समाजका सम्बन्ध है, यह अत्यन्त विवादास्पद कानून है ।

(२) इससे ट्रान्सवालके भारतीय समाजका दर्जा गिरता है और उसका अपमान होता है, जिसका पात्र वह अपने गत इतिहासको देखते हुए कतई नहीं है ।

(३) वर्तमान व्यवस्था एशियाइयोंकी कथित भरमारको रोकनेके लिए काफी है ।

(४) ब्रिटिश भारतीय समाजने कथित भरमारके सम्बन्धमें दिये गये वक्तव्योंका खण्डन किया है।

(५) यदि सम्मान्य सदनको इस खण्डनसे सन्तोष नहीं है, तो यह सभा माँग करती है कि कथित भरमारके प्रश्नकी खुली जांच एक अदालती और ब्रिटिश जाँच समितिसे करा ली जाये । ब्रिटिश भारतीयोंकी यहाँ समवेत यह सार्वजनिक सभा सम्मानपूर्वक उस मसविदारूप एशियाई अधिनियम संशोधन अध्यादेशके विरुद्ध आपत्ति प्रकट करती है, जिसपर अभी ट्रान्सवालकी विधान परिषदमें विचार किया जा रहा है, और स्थानीय सरकारसे तथा ब्रिटिश अधिकारियोंसे नम्रतापूर्वक प्रार्थना करती है कि वे मसविदारूप अध्यादेशको निम्न कारणोंसे वापस ले लें :

प्रस्ताव २

(१) यह महामहिमके प्रतिनिधियोंकी भूतकालीन घोषणाओंके स्पष्ट विरुद्ध है ।

(२) इसमें ब्रिटिश एशियाइयों और विदेशी एशियाइयोंमें कोई भेद स्वीकार नहीं किया गया है ।

(३) इससे भारतीयोंका दर्जा दक्षिण आफ्रिकाकी आदिम जातियों और रंगदार लोगोंसे

भी नीचा हो जाता है ।

 
  1. १. पाँचवें प्रस्तावके अनुसार प्रस्ताव २, ३ और ४ ट्रान्सवालके गवर्नर द्वारा उपनिवेश-मन्त्री और भारत- मन्त्रीको भेजे गये थे। ट्रान्सवालके गवर्नरसे यह प्रार्थना भी की गई थी कि वे इनका सारांश भारतके वाइसरायको भेज दें। (देखिए पृष्ठ ४३४ और कमांड ३३०८, फरवरी १९०७) ।