करनेवाले हैं; इसलिए उसपर मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है। आजका मुख्य प्रस्ताव तो एक ही है कि अपनी अर्जी में यदि हम सफल न हों तो हमें क्या करना चाहिए ? आज तक अपनी फरियादकी सुनवाई न होनेसे हम कष्ट भोगते रहे हैं। लेकिन इस कानूनके कष्ट असह्य हैं। इसलिए हम यह प्रस्ताव करना चाहते हैं कि यदि इंग्लैंडकी सरकार भी हमपर जुल्मकी वर्षा करना चाहती हो, तो जुल्म भोगनेकी अपेक्षा जेलमें जाना ज्यादा अच्छा है । हमेशा जब बहुत दुःख पड़ता है तभी मनुष्यको सच्चा इलाज मिलता है। हमारे लिए वह समय आ गया है। और हम सबका यही कर्तव्य है कि हम आज इस स्पष्ट निर्णयपर आ जायें कि हम इस कानूनको स्वीकार नहीं करेंगे, बल्कि जेल जायेंगे । जेल जानेमें लज्जित होने योग्य कोई बात नहीं। और मैं खुदासे प्रार्थना करता हूँ कि वह हमें इतनी ताकत और बुद्धि दे जिससे हमारा प्रस्ताव बरकरार रहे।
यह समय हमारे लिए कथनीका नहीं, करनीका है। इस समय हमें साहस करना होगा और उस साहसमें नम्रता बरतनी होगी। किसी भी प्रकारके कड़वे शब्द न कहे जायें, न सुने ही जायें।
अध्यक्ष महोदयके भाषणके बाद नीचे लिखे प्रस्ताव[१] स्वीकार किये गये :
प्रस्ताव १
यह सार्वजनिक सभा नम्रतापूर्वक विधान परिषदसे प्रार्थना करती है कि एशियाई कानून पास न किया जाये; क्योंकि,
(१) भारतीय कौमकी रायमें यह कानून बहुत ही आपत्तिजनक है।
(२) यह कानून अकारण भारतीय कौमको गिरानेवाला व उसका अपमान करनेवाला है।
(३) यदि भारतीय बिना परवानेके ट्रान्सवालमें प्रवेश करते हों, तो उन्हें रोकने के लिए मौजूदा कानूनमें बहुत व्यवस्था है ।
(४) भारतीयोंके जत्थे के जत्थे बिना परवानेके ट्रान्सवालमें प्रवेश करते हैं, इस अफवाहको भारतीय कौम स्वीकार नहीं करती ।
(५) यदि विधान परिषदको ऊपरके तथ्य सच न मालूम होते हों तो भारतीय कौम प्रार्थना करती है कि इसकी न्यायपूर्ण और ब्रिटिश पद्धतिके अनुरूप जाँच की जाये ।
प्रस्ताव २
यह सार्वजनिक सभा नम्रतापूर्वक एशियाई अध्यादेशके खिलाफ आवाज उठाती है और स्थानीय सरकार एवं बड़ी सरकारसे प्रार्थना करती है कि वे इस कानूनको वापस ले लें; क्योंकि,
(१) यह कानून महामहिम सम्राट् द्वारा दिये गये पिछले वचनोंके खिलाफ है।
(२) यह कानून ब्रिटिश भारतीय और अन्य एशियाइयोंके बीच जरा भी भेद नहीं करता ।
(३) इस कानूनसे काफिरों और अन्य काले लोगोंकी अपेक्षा भारतीयोंकी स्थिति
ज्यादा खराब हो जाती है।
- ↑ १. मूल प्रस्तावोंके लिए देखिए “सार्वजनिक सभा", पृष्ठ ४३०-४ ।