रोकनेके लिए शान्ति-रक्षा अध्यादेशके प्रशासनको विकृत किया गया है, उसी प्रकार इस नये अध्यादेशके द्वारा १८८५ के कानून ३ के क्षेत्रको भी विकृत कर दिया गया है। यह एक ऐसी माँगको पूरा करनेके लिए है जो डच राज्यमें कभी नहीं की गई थी। डच कानून व्यापारियोंके लिए बनाया गया था । उसकी नीति उन प्रवासियोंको दण्डित करना था जो व्यापार करना चाहते थे, न कि आव्रजनको परिमित करना । इसी कारण पहले उसके द्वारा २५ पौंडका पंजीयन कर लगाया गया था, जो बादमें ब्रिटिश सरकारके हस्तक्षेपके कारण घटाकर ३ पौंड कर दिया गया ।
वर्तमान अध्यादेशसे १८८५ के कानून ३ का सिर्फ संशोधन करनेकी अपेक्षा की जाती है । वह कानूनका क्षेत्र वही रखनेके लिए है, बदलनेके लिए नहीं । परन्तु इस अध्यादेशमें शिनाख्तकी ऐसी पद्धतिकी व्यवस्था है, जो अमलमें उन लोगोंके लिए अत्यन्त कष्टकारक होगी, जिन्हें वह माननी पड़ेगी। पंजीयनका प्रयोजन भारतीय आबादीकी गणना करना नहीं, बल्कि निम्नलिखित है :
उपनिवेशमें रहनेवाले प्रत्येक भारतीयको अपने पास एक पंजीयन प्रमाणपत्र रखना होगा, जिसमें शिनाख्तके अपमानजनक विवरण होंगे। उसे अपने नवजात बच्चेका स्थायी पंजीयन कराना होगा और शिनाख्त के लिए ऐसे विवरण देने होंगे जो लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा बनाये जानेवाले अधिनियमके अनुसार आवश्यक हों। शिनाख्तकी इन्हीं शर्तोंके साथ आठ वर्षसे अधिक आयुवाले बच्चोंका पंजीयन कराना होगा ।
यह सब बिलकुल नया है और १८८५ के कानून ३ में इसका कभी इरादा तक नहीं रहा । फिर भी आपको यह कहते हुए कोई संकोच नहीं कि अध्यादेश अधिवासी भारतीय समाजपर कोई निर्योग्यता नहीं लादता ।
मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सत्याग्रहकी नीति कोरी धमकी<ref> नहीं है । यह मेरे देशवासियोंका असहनीय परिस्थितियोंको स्वीकार न करनेका शुद्ध संकल्प है । और अगर इससे, जैसा आपका संकेत है, 'उनके सामूहिक रूपमें निर्वासनका महँगा झगड़ा' उठ खड़ा होगा, तो यह एक बड़ी राहत होगी। यह ब्रिटिश नीतिका एक नया अतिक्रमण होगा; अलबत्ता, साम्राज्यवादियोंके नई विचारधारावाले दलके लिए -- जिसके आप निस्सन्देह अग्रणी हैं जिसके आप निस्सन्देह अग्रणी हैं -- इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ेगा। मेरे देशवासी बहुत समय तक पीछे रह चुके हैं। इसमें उनकी विचारशीलता नहीं थी, जैसा कि आपका कहना है; बल्कि विचारहीनता थी। अपने अलगावको छोड़नेसे उनको कुछ भी लाभ न हो, तो ज्यादा हानि भी न होगी । अपने खयालसे वे पहले ही अपना लगभग सब-कुछ खो चुके हैं।
अगर दक्षिण आफ्रिकावासी आपके उकसानेके फलस्वरूप भारतीय प्रश्नमें कुछ दिलचस्पी लेने लगें तो मैं दावेसे कहता हूँ कि, आपके उपर्युक्त सुझावके बावजूद, उनकी आँखें खुल जायेंगी। उन्हें यह भी समझ में आ जायेगा कि उन्होंने ब्रिटिश भारतीयोंको कितना गलत समझा है और इनके प्रति कितने भारी अपराध किये हैं ।
आपका, आदि,
अब्दुल गनी
अध्यक्ष
ब्रिटिश भारतीय संघ
स्टार, २२-९-१९०६