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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४८३

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स्वर्गीय न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयबजी

जो भारतीय इस समय उपनिवेशमें रहते हैं, वे स्त्रियोंको पत्नियोंके रूपमें ला रहे हैं, ये वस्तुतः उनकी पत्नियों जैसी कुछ नहीं होतीं, प्रायः दुश्चरित्र स्त्रियाँ होती हैं। " भारतीय स्त्री जातिपर इस दुष्टतापूर्ण लांछनपर सही बैठने लायक एक ही वाक्यका प्रयोग मैं कर सकता हूँ सो यह कि, यह एक लज्जाजनक असत्य है । आपको उस प्रवासी अधिकारीका नाम छाप देना चाहिए जिसने, बताया जाता है, यह बहुमूल्य कारण दिया है। मैं उसको चुनौती देता हूँ कि वह किसी एक भी ऐसी स्त्रीका नाम प्रकाशित करे। मुझे शान्ति-रक्षा अध्यादेशके प्रशासनका बहुत बड़ा अनुभव है; किन्तु मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इसपर अमलके पूरे अरसे में मेरी जानकारी में ऐसी एक भी दुश्चरित्र स्त्री उपनिवेशमें आपके संवाददाताके सुझाये हुए तरीकेसे प्रविष्ट नहीं हुई है । मैंने सरकारी तौरपर जानकारी माँगी है, जो आपके पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत की जायेगी।[] इस बीच, क्या यह कुछ आश्चर्यकी बात नहीं है कि ट्रान्सवालके नियमोंके सम्बन्धमें स्पष्टीकरण इतनी दूर स्थित डर्बनसे चलकर यहाँ आये ?

आपका, आदि
मो० क० गांधी

[ अंग्रेजीसे ]
ट्रान्सवाल लीडर, २२-९-१९०६

 

४५२. स्वर्गीय न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयबजी

इधर कुछ दिनोंसे भारत अपने योग्यतम सपूतोंको खोता जा रहा है। अभी कलकी ही बात है कि हमें स्वर्गीय श्री उमेशचन्द्र बनर्जीके देहावसानकी बात[] लिखनी पड़ी थी। आज हमको उन्हीं के समान प्रतिष्ठित दूसरे देशभक्त न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयबजीकी मृत्युका समाचार देना पड़ रहा है । स्वर्गीय श्री बनर्जी के समान ही श्री बदरुद्दीन तैयबजी भी नौरोजी परम्पराके थे । वे बम्बईकी तरफके एक सर्वप्रथम बैरिस्टर थे, जिन्होंने १८६७ में बैरिस्टरी शुरू की थी। वे ही पहले भारतीय थे जिनका नाम बम्बईके उच्च न्यायालय में एडवोकेटके रूपमें दर्ज हुआ था । स्वर्गीय श्री बदरुद्दीन तैयबजी निजी अध्यवसाय और योग्यताके कारण शीघ्र ही अपने व्यवसायके उच्च शिखरपर पहुँच गये । वे राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकोंमें थे और उसके तीसरे अधिवेशनके अध्यक्ष थे। उनका उर्दूका ज्ञान अनूठा था । अंग्रेजी या उर्दू दोनों भाषाओंके वक्ताके रूपमें वे समान रूपसे चमके । बम्बई उच्च न्यायालयके न्यायाधीशके रूपमें उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी और उनके फैसले सदैव सही और न्याययुक्त माने जाते थे । अपने सहधर्मियोंके बीच उनके समाज सुधारक कार्य अत्यन्त

जोर देते हैं, क्योंकि इस सावधानीके बिना वे यह अनुभव करते हैं कि लोग असीमित संख्या में स्त्रियोंको केवल यह कहकर ला सकते हैं कि वे उनकी विवाहिता है ।

"कुछ भी हो, जो स्त्री फोक्सरस्टमें रोकी गई थी, उसका उदाहरण ट्रान्सवालमें अनधिकृत प्रवेशको सीमित करनेकी अधिकारियोंकी कार्रवाईका अकेला उदाहरण नहीं है। और स्थानीय रूपसे प्राप्त सूचनासे निश्चय ही यह प्रकट होता है कि ट्रान्सवालके एक अखबारकी "सरकारका स्त्रियोंके विरुद्ध युद्ध” टिप्पणी तभी उचित है जबकि

कोई ट्रान्सवालके नये कानूनोंको उस दृष्टिसे देखे । "

  1. १. देखिए “ पत्र : लीडरको", पृष्ठ ४५६ और पृष्ठ ४६१ ।
  2. २. देखिए, " स्वर्गीय उमेशचन्द्र बनर्जी ", पृष्ठ ४०८ |