जोहानिसबर्ग की चिट्ठी ४५३ यदि कानून पास हो जायेगा तो हम सब अदालतमें जाकर कहेंगे कि हमें पकड़िए । (तालियाँ) । पाँचेफस्ट्रमके श्री गेटाने गुजराती में दूसरे प्रस्तावका समर्थन किया । श्री ईसप मियाँ श्री ईसप मियाँका काम तीसरा प्रस्ताव पेश करना था । उन्होंने कहा : ट्रान्सवालमें अंग्रेजी राज्य रूसके राज्यसे भी ज्यादा खराब है । में स्वयं श्री डंकनसे मिलने प्रिटोरिया गया था। उन्होंने बहुत-सी बातें कही थीं। लेकिन किया कुछ भी नहीं । उलटे हमें दगा दिया है। हमें एक शिष्टमण्डल विलायत भेजना ही चाहिए। वहाँ हम शोर मचायेंगे, और उतनेपर भी यदि सरकारने नहीं सुना तो हम जेल जायेंगे। मैं ट्रान्सवालमें उन्नीस वर्षोंसे हूँ। लेकिन जो जुल्म मैंने पिछले तीन वर्षोंमें देखे हैं वैसे कभी नहीं देखे | श्री ई० एस० कुवाडिया इस प्रस्तावका समर्थन करते हुए श्री इब्राहिम सालेजी कुवाडियाने नीचे लिखे अनुसार भाषण दिया: एशियाई अध्यादेशके मसविदेके सम्बन्धमें अध्यक्ष आदि महोदयगण कह चुके हैं, इसलिए मैं मानता हूँ कि मेरे लिए बोलनेको कुछ नहीं रह जाता। इतना तो साफ है कि जिस सरकारके राज्यमें जुल्म नहीं है वहाँकी प्रजा सुखी है, और वहाँ प्रजा और सरकार दोनों आरामसे रहते हैं । उसी प्रकार हमारे इन्हीं अंग्रेज मित्रोंके द्वारा उकसाये जानेपर लड़ाईसे पहले हमारी भूतपूर्व सरकार (बोअर सरकार) ने हमारे लिए जुल्मी कानून बनाया था। लेकिन चूंकि उस सरकारके मनमें हमारे लिए दया थी, इसलिए वह उस कानूनको अमलमें नहीं लाई । अंग्रेजोंके साथ लड़ाई चली तबतक उसकी मेहर- बानीसे हम चैनसे रहे। अतः उसके लिए हमें बोअर सरकारका एहसान मानना चाहिए। अब चूंकि हमारी सरकारने इस उपनिवेशको जीत लिया है इसलिए हमें आशा थी कि अब तो हमें सब हक मिल जायेंगे और इसी आशाके मुताबिक हमारी सरकारने हमें वचन भी दिये थे। लेकिन दुर्भाग्यसे हम आज उससे उलटा ही देख रहे हैं और हमारे खिलाफ ऐसे कानून बनाये जा रहे हैं जो हमसे सहन नहीं किये जा सकते। अतः हमारा कर्त्तव्य है कि यदि सरकार हम लोगोंके लिए उचित कानून बनाये तो हमें उसके अधीन रहना चाहिए; किन्तु यह कानून वैसा नहीं है। हमारी सरकारने जबसे इस उपनिवेशको जीत लिया है तबसे वह खासकर हम लोगोंपर एकके बाद एक सख्त प्रतिबन्ध लगाती जा रही है। उन प्रतिबन्धोंको हमने आजतक सहन किया। किन्तु हमारा मन भर गया है । जैसे नदीमें बाढ़ आनेपर नदीके भर जानेसे पानी बाहर निकल जाता है, यानी नदीमें जगह ही नहीं रहती, उसी प्रकार अब हममें ऐसे जुल्मी कानूनोंको सहन करनेकी शक्ति नहीं रही। इसलिए अब हमें इस अध्यादेशके मसविदेके विरोधमें सख्त कदम उठाना चाहिए, यद्यपि हमसे यह कहा जा रहा है कि हम उनकी रैयत हैं और हमारे फायदेके लिए यह कानून बनाया जा रहा है। यदि यह बात है तो इस सम्बन्धमें मुझे इतना ही Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४८९
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