४५८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कहा जाता है कि 'लीडर' के डर्बन-स्थित संवाददाताको किसी प्रवासी-अधिकारीने यह कारण बताया है कि ट्रान्सवालमें भारतीय ऐसी भारतीय स्त्रियोंको, जो दुश्चरित्र हैं, अपनी पत्नियोंके रूपमें ले आये हैं। यदि आप मुझे बता दें कि इसके लिए आपके विभागका कोई अधिकारी जिम्मेवार है तो मैं आपका आभारी हूँगा । मैं यह भी कह दूं कि मैंने प्रिटोरियाके एशियाई - पंजीयकसे भी दरियाफ्त किया है और उन्होंने इस वक्तव्यका खण्डन किया है। ' [ आपका, आदि, मो० क० गांधी ] [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, ६-१०-१९०६ ४५९. जोहानिसबर्ग की चिट्ठी सितम्बर २५, १९०६ ट्रान्सवालमें भारतीय समाजका पिछला सप्ताह ऐसा बीता, जैसे किसी बीमारको सन्निपात हो गया हो और वह बिस्तरपर छटपटा रहा हो। शिष्टमण्डल जाने ही वाला था । सब निश्चित हो गया था। इतनेमें, अब मालूम हुआ है, लॉर्ड सेल्बोर्नका तोपके गोलेके समान एक द्वयर्थी पत्र आ गया जिससे फूट पड़ गई। सभी ने यह समझा कि 'द्वारकाकी छाप' वाला कायदा पास हो गया है, इसलिए अब शिष्टमण्डल न जाये, यही ठीक है। मंगलवारकी दुपहर तक परिस्थिति ऐसी थी । शामको उच्चायुक्तकी ओरसे टेलीफोन आया कि लॉर्ड एलगिनने कानून पसन्द किया है, इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंने उसे पास कर दिया है। इसपर फिर नई योजना बनी। उसी रातको कुछ भारतीय एक साथ श्री हाजी वजीर अलीसे मिले और उनकी सम्मति लेकर उन्होंने यह सोचा कि शिष्टमण्डलमें अकेले उनको ही भेजने के लिए समाजसे सिफारिशकी जाये। बुधवारको उस विचारपर अमल किया गया। लेकिन पिछले सप्ताह हर भारतीयके सामने यह स्पष्ट हो गया कि मनुष्यका वश सब जगह नहीं चलता । श्री ग्रेगरोवस्की तथा श्री लिखटनस्टाइनकी निश्चित राय थी कि शिष्टमण्डलमें श्री गांधीको अवश्य जाना चाहिए और शिष्टमण्डल भेजा जाये, इसमें तो शक ही नहीं है । प्रिटोरियाके समाजकी ओरसे इस बातपर जोर दिया गया कि डर या लालचसे लोगों में फूट न पड़े और वे नये पंजीयनपत्र न ले लें, इसके लिए ट्रान्सवालमें श्री गांधीका रहना जरूरी है। यह दूसरी राय थी । नेटालसे सबको सख्त तार मिला कि मूल विचारके अनुसार शिष्टमण्डल भेजना विलकुल जरूरी है। इसलिए शुक्रवारको सभा हुई और सर्वसम्मतिसे निर्णय हुआ कि श्री अली और श्री गांधी दोनों जायें। श्री अब्दुल गनीको भी जाना चाहिए, यह सबका विचार था। लेकिन कुछ सबल कारणोंसे उनका जाना सम्भव न देखकर अत्यन्त खेदपूर्वक उस विचारको छोड़ना पड़ा। श्री गांधीने जाना स्वीकार करनेके साथ सभी नेताओंसे यह पत्र लिख- वाया कि चाहे जैसी भी मुसीबत हो, वे चौथे प्रस्तावको निभायेंगे। यह पत्र अगले अंकमें दिया जायेगा । १. देखिए पिछला शीर्षक । २. सबसे ऊँची और अटल मुहर । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/४९४
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