४६८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय जिस सिपाहीने इन दोनोंकी जाँच की थी वह अपने बयानमें नहीं बता सका कि उसने लड़केको देखा या नहीं। लेकिन लड़केके अंगूठोंके निशान लगवाये गये थे, यह उसके बयानसे साबित होता था । मजिस्ट्रेटने पिताको निर्दोष ठहराया है और लड़केको ५० पौंड जुर्माने या तीन महीनेकी सादी कैदकी सजा दी है। ऐसे बालकको इतनी बड़ी सजा देना बहुत ही भयंकर माना जायेगा। मजिस्ट्रेट यदि जरा भी दूरन्देशीसे काम लेते तो उनकी समझमें आ जाता कि ऐसी सजा नादान बालकको नहीं दी जा सकती। इस सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालयमें अपील की गई है और सम्भव है कि लड़का छूट जायेगा । श्री क्विन और भारतीय श्री क्विन जोहानिसबर्गके महापौर और व्यापार संघ के अध्यक्ष भी हैं। उन महोदयने अपनी मासिक रिपोर्ट में एशियाई अध्यादेशको वाजिब कहा है। बहुतेरे भारतीय विना अनुमतिपत्रके दाखिल हो गये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि इस तरहका अध्यादेश आवश्यक था । यूरोपवाले [ कम खर्च ] रहन-सहनमें एशियाइयोंका मुकाबला नहीं कर सकते। यदि इस कानूनको सख्त माना जाये तो, उसमें दोष उन्हीं लोगोंका है। श्री नीवेतने पूनियाके' मामलेका उदाहरण देकर कहा था कि औरतोंपर जुल्म हो, यह तो व्यापारी संघ नहीं चाहेगा। इसके उत्तरमें क्विन महोदयने कहा कि ये लोग जानते हैं कि इन्हें अनुमतिपत्रके बिना आने नहीं दिया जायेगा फिर भी आते हैं, इसलिए यह इन्हीं लोगोंकी गलती है । [ गुजरातीसे ] इंडियन ओपिनियन, २९-९-१९०६ ४७०. ट्रान्सवालका कानून बड़ी सरकारकी स्वीकृति शिष्टमण्डलका जाना स्थगित " मनचेता अधविच रहे, हर चेत सो होय" ट्रान्सवालके भारतीयोंके सम्बन्धमें यही पंक्ति सार्थक हुई है। लॉर्ड एलगिनका उत्तर इस बार, सोमवार यानी १ अक्तूबरको, जो शिष्टमण्डल भारतीयोंकी पुकार लेकर विलायत जानेवाला था, उसके जहाजसे रवाना हो जानेकी सम्भावना थी । वास्तवमें शिष्टमण्डल पिछले सोमवारको ही जानेवाला था। लेकिन उसमें विघ्न आ गया और एक सप्ताहकी देरी हुई। जहाजका पास प्राप्त करनेकी तैयारी हो रही थी। सब जगह पत्र लिख दिये गये थे कि सोमवारको शिष्टमण्डल रवाना होगा। इतनेमें, यानी मंगलवारको सबेरे, लॉर्ड सेल्बोर्नका नीचे लिखे अनुसार पत्र आया : लॉर्ड सेल्बोर्नके द्वारा लॉर्ड एलगिनने कहलाया है कि नये संशोधनोंके द्वारा भार- तीयोंको जितनी सुविधाएँ दी जानी चाहिए वे नये कानूनसे नहीं प्राप्त होतीं, यह लॉर्ड एलगिन समझते हैं; फिर भी उन्होंने उस कानूनको पसन्द किया है; क्योंकि उसके १. देखिए "टान्सवालमें भारतीय स्त्रियोंकी मुसीबत ", पृष्ठ ४५० । २. पत्रपर २४ सितम्बर १९०६ की तारीख थी। इसपर उनके निजी सचिव डी० सी० मैल्कमके हस्ताक्षर थे । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/५०४
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