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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/५१०

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४७४ सम्पूर्ण गांधी वाङमय आयेगी, यह कहा नहीं जा सकता; इसलिये सत्कर्म रूपी सम्बल इकट्ठा कर ले।" यही घटना उलटे रास्ते जानेवालेको चेताती है: “ नादान, अभिमान छोड़ और ईश्वरसे डरकर चल । कालको निवाला भरने में कुछ भी देर नहीं लगेगी । " [ गुजरातीसे ] इंडियन ओपिनियन, ६-१०-१९०६ ४७५. ट्रान्सवालके भारतीयोंका कर्त्तव्य ट्रान्सवालकी स्थितिके सम्बन्ध में हमने दूसरी जगह पूरा विवरण दिया है, इसलिए इस जगह हमें ज्यादा कुछ नहीं कहना है । यह समय इतना नाजुक है कि ट्रान्सवालके बाहर रहने- वाले सभी भारतीय चौंक गये हैं। सभीको लग रहा है कि ट्रान्सवालमें भारतीयोंने जो कदम उठाया है वह बहुत ही मुश्किल है। उसके सफल होनेपर ही उसे सही कहा जा सकता है । भारतीयोंने जो प्रस्ताव पास किया है वह अनोखा है और नहीं भी है। कानूनके सामने आत्म- समर्पण करनेके बजाय जेल जानेका जो निर्णय किया गया है वैसा निर्णय आजतक भार- तीयोंने दुनियामें कहीं भी किया हो, सो दीख नहीं पड़ता। इससे हम उस कदमको अनोखा कहते हैं । दूसरी ओर हमने यह भी कहा है कि उसमें अनोखापन नहीं है । इसका कारण यह है कि इससे मिलते-जुलते उदाहरण बहुतसे मिलते हैं । हम कई बार नाराज होनेपर हड़ताल करते हैं; और भारतमें कई बार हड़तालको हम अपना कर्त्तव्य मान लेते हैं; खासकर देशी राज्यों में हड़ताल द्वारा हम न्याय प्राप्त करते हैं। वहाँ हड़तालका अर्थ इतना ही होता है कि हमारे राजाने जो कदम उठाया है वह हमें पसन्द नहीं है। कानूनके विरोधका ऐसा रिवाज हममें तवसे चला आ रहा है जब अंग्रेज लोग जंगली थे । इसलिए सच कहा जाये तो ट्रान्सवालके भारतीयोंने जो प्रस्ताव पास किया है उसमें नयापन कुछ नहीं है और इसलिए हमें घबड़ाना नहीं चाहिए। इतना ही नहीं, दक्षिण आफ्रिकामें भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं । स्वर्गीय राष्ट्रपति क्रूगरने जब भारतीयोंको मलायी बस्तीसे हटाकर टोबियानस्कीके फार्मपर ले जानेकी योजना की थी, तब एमरिस ईवान्सने, जो ब्रिटिश एजेंट थे, हमें स्पष्ट सलाह दी थी कि हम राष्ट्रपतिके आदेशको कतई न मानें। इससे यह हुआ कि पुलिसकी जाँच-पड़ताल और जासूसोंके घरोंमें घुस जानेके बावजूद हम लोग अटल रहे और सफल हुए । परवानेकी तकलीफ थी, तब भी भारतीयोंने बेधड़क बिना परवानेके शहरोंमें व्यापार किया। वे बोअर सरकारसे नहीं दवे और विजयी हुए। उस सरकारने हमें बस्तीमें भेजनेका बहुत प्रयत्न किया, लेकिन वह भेज नहीं सकी । लड़ाईके बादके उदाहरण ढूंढ़ना चाहें, तो वे भी मिल सकते हैं। लॉर्ड मिलनरने जब भारतीयोंपर 'बाजार'- सूचना रूपी तलवार उठाई थी उस समय एक बार तो लोग घबड़ा गये थे। लेकिन फिर विचार किया और अन्तमें बस्ती में नहीं जानेका निर्णय किया । पाँचेफ्स्ट्रम में सम्मन भी जारी किये गये थे, लेकिन उन्हें वापस लेना पड़ा था। मूअर साहबने लोगोंके फोटोवाले पास शुरू किये थे, लेकिन उन्हें लेनेमें लोगोंने आनाकानी की और उस नियमको उठाना पड़ा। Gandhi Heritage Portal