४८०. नये नगरपालिका- कानूनके सम्बन्धमें दो शब्द जोहानिसबर्ग नगरपालिकाको कुछ अधिकार देनेवाला कानून हम दूसरी जगह दे रहे हैं। उसके विरुद्ध कहनेको कुछ नहीं रहता। वह कानून सबपर लागू होता है; और, कहा जा सकता है कि शहरकी स्वास्थ्य-रक्षाके हेतु अथवा ऐसे ही दूसरे कारणोंसे आवश्यक है । बहुतेरे कानूनोंके सम्बन्धमें तो हमें अपने ही विरुद्ध खड़े होनेकी जरूरत है। हम अपना आँगन साफ न रखें और उससे हमें दुःख उठाना पड़े, तो उसके लिए हम दूसरोंको दोष नहीं दे सकते । उपर्युक्त कानूनसे यह मालूम होता है कि यदि हम स्वच्छता के नियम भंग करेंगे तो बड़ी कठिनाई होगी । यदि हम पहलेसे नहीं चेतेंगे तो फिर हमारे ही हाथों हमारा सिर फूटेगा । हमारे परवाने छिन जायेंगे और हम हाथ मलते रह जायेंगे। जिनके आस-पास दुश्मन रहते हों उन्हें बहुत ही चेतकर रहना पड़ता है । यहाँकी भाषा में कहें तो ऐसे लोगोंको लागर रचकर रहना पड़ता है । हमारी यही हालत है। स्वच्छता आदिके सम्बन्धमें हमें गोरोंसे बढ़ जाना है । यह स्थिति अभी नहीं आई है। लेकिन यदि हम नींदसे उठें, आलस्य छोड़ें, लगन- शील बनें और थोड़ा-सा लोभ छोड़ें तो हम गन्दगीके पाशसे छूट सकते हैं। गन्दगी रूपी नासूर हमें सदा ही पीड़ा देता है, और क्षीण कर डालता है। नासूरको चीरते समय जैसे पहले दर्द होता है और बादमें हम सुखी होते हैं, उसी तरह गन्दगी रूपी नासूरको चीरनेकी आवश्यकता है। यह काम हमीदिया व हिन्दू आदि सभाओंका है, और वह भी सिर्फ ट्रान्सवालमें ही नहीं, सभी जगह । क्या ये सभाएँ जागेंगी ? [गुजरातीसे] इंडियन ओपिनियन, १३-१०-१९०६ ४८१. दावानल आजकल दक्षिण आफ्रिकाके सार्वजनिक मण्डलोंमें एशियाई सवालको लेकर विशेष चर्चा होने लगी है। ऐसी चर्चा में जहाँ जरा-सा भी मौका हाथ आता है, भारतीयोंको तुरन्त आगे रख दिया जाता है । इन निन्दकोंमें व्यापार-संघ मुख्य हैं । डेलागोआ-बेमें व्यापार संघोंकी एक सभा थी, जिसके समक्ष भारतीयोंको पृथक् बस्तियोंमें भेजनेका सुझाव पेश किया गया था । यह हम पहले कह चुके हैं। अभी मैरित्सबर्ग में व्यापार संघकी एक बैठक हुई थी। उसमें संघने भारतीय व्यापारियोंके सम्बन्धमें अपने कुछ विचार प्रकट किये । अध्यक्षने अपने भाषण में कहा था कि रंगदार व्यापारियोंकी संख्या बढ़ी है और गोरोंकी संख्या घटी है । अध्यक्ष श्री ग्रिफिनने बोलते समय आँकड़ोंका खयाल रखा होगा, सो नहीं जान पड़ता । भारतीय व्यापारियोंकी संख्या इतनी बढ़ी है कि उसे सुनकर चौंक जायेंगे, ऐसा कहनेसे पहले उन्हें साबित करना चाहिए था कि एशियाई व्यापारियोंकी संख्या इतनी बढ़ी है। फिर श्री ग्रिफिन यह भी कहते हैं कि गाँवों में १. आक्रमणसे रक्षाके लिए बैलगाड़ियोंका घेरा, या अन्य प्रकारकी तात्कालिक किलावन्दी | २. २ अक्तूबर १९०६को । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/५२१
दिखावट