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परिशिष्ट • औपनिवेशिक दृष्टि-बिन्दु बिल्कुल भिन्न प्रकारका है ।.. . मैं महसूस करता हूँ कि ५०७ एक तरहसे वह अकाट्य है । अगर [ उपनिवेशी ] स्वार्थी है तो ऐसा वह आत्म-रक्षणके लिए है।... वह ऐसी किसी व्यवस्थाको मानने से इनकार करता है जिससे उसका जीवन-स्तर सदाके लिए नीचा गिर जाये, और फिर वह देखता है कि उसके सामने काली प्रजासे निपटने की भारी समस्याके सिवा गेहुएँ रंगवाले भारतीय प्रवासियोंकी समस्या से निपटनेका संकट भी उपस्थित होता है। ऐसा लगता है इस एक ही साम्राज्यके अन्दर दो विपरीत शक्तियाँ एक दूसरेके विरुद्ध काम कर रही हैं । और यदि उसकी वापसी अपेक्षित हो, तो यह इन परस्पर विरोधी तत्वों और सिद्धान्तोंके बीच कर सकती है कि उनके बीच किसी प्रकार संघर्ष कि बाहर जानेवाले प्रवासीको सदैव उसकी अवसर आनेपर उसके लौटनेकी इन परिस्थितियोंमें सरकारका कर्तव्य क्या है ? सामंजस्य स्थापित करने और इस तरह काम करनेकी कोशिश न हो ।. सर्वप्रथम उसे यह प्रयत्न करना चाहिए मजदूरी की उचित शर्तें प्राप्त हों । यह देखना सरकारका कर्तव्य है कि उसकी अपनी प्रजाके लिए लाभजनक शर्ते तय हों... और एक बार करार हो जानेपर यह देखना भी उसीका कर्तव्य है कि बादमें इन शर्तोंमें जल्दबाजीमें या आवेश [ और अविवेक ]के कारण कोई ऐसा परिवर्तन न किया जाये जो प्रवासीके लिए हानिकर है। इसके अलावा, सरकारको यह भी देखना चाहिए कि एशियाइयोंपर थोपे गये प्रतिबन्ध कमसे कम कष्टदायी हों। फिर सरकारको यह भी देखना चाहिए कि किसी भी जगह ऐसी दुखदायी स्थिति न उत्पन्न होने पाये जिसमें चारित्र्यवान, प्रतिष्ठित और शिक्षित भारतीय भद्रपुरुषों के साथ साधारण कुलियों-जैसा व्यवहार किया जाये और उन्हें अपनेसे बहुत हीन कोटि और पेशेके लोगोंके साथ रहनेपर विवश किया जाये। ( हर्ष ध्वनि ) . एक दूसरा सुझाव भी दिया गया है - वह यह कि सरकारको कोई अन्य ऐसा प्रदेश ढूढ़ने की कोशिश करनी चाहिए जहाँ हमारे भारतीय सह- नागरिक जाकर बस सकें और जहाँ वे उन निर्योग्यताओं और प्रतिबन्धोंसे मुक्त हों जिनका मैंने पहले जिक किया है । जहाँतक मेरा सवाल है, यह ऐसा सुझाव है, जिसे मैं उतना अच्छा नहीं समझता जितना कि इस सुझावका प्रतिपादन करनेवाले कुछ अधिकारी समझते हैं। तथापि मुझे आशा है कि हालकी वे घटनाएँ जिनका परिणाम हमारी भारतीय सह-प्रजाकी विजयमें हुआ है, उपनिवेशकी सरकार और साम्राज्य सरकार इन दोनोंके लिए एक सबक है । उपनिवेशकी सरकार के लिए सबक यह है कि वह इन प्रवासियोंके अधिकारोंकी उपेक्षा करके नहीं चल सकती. और सम्राट्की सरकार के लिए यह सबक है कि ब्रिटिश साम्राज्य के किसी भी उपनिवेश में रहनेवाले भारतके लाखों गेहुऍ रंगके लोगोंके प्रति उसकी जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी है जितनी कि उसकी अपनी जातिके गोरोंके प्रति है । (तालियाँ) । [ अंग्रेजीसे ] इंडियन ओपिनियन, ७-३--१९०८ Gandhi Heritage Portal