५२. नेटालके कुछ प्रश्न नेटालके भारतीयोंको स्थिति हम दिनोंदिन बिगड़ती देख रहे हैं । यहाँको वर्तमान सरकार एकदम खराब, बिना पेंदोको और भारतीयोंके सम्बन्ध में लापरवाह है। व्यापारियोंको परवानों (लाइसेंस) की तकलीफ शुरू होगी । मुक्त गिरमिटियोंको कर देना पड़ता है, इससे वे पिसे जा रहे हैं । जो गिरमिटीमें गुलामी भोग रहे हैं, उनके मालिक उनका बुरा हाल कर रहे हैं । नये जुल्मी कानून बनते जा रहे हैं । पाठशालाओंको जो धन दिया जाया करता था उससे कम दिया जाने लगा है । चौदह वर्ष से अधिक उम्रवाले बच्चोंको प्रवेश नहीं दिया जाता । इस सबके लिए क्या उपाय किया जाये ? अर्जी दें या नहीं ? अर्जीसे फायदा होगा ? अगर न हुआ तब क्या किया जाये ? सत्याग्रहकी लड़ाई छेड़नेकी बात की जाये, तो सब अलग-अलग लड़ें या साथ-साथ ? इन तमाम सवालोंके जवाब हमें धैर्यपूर्वक खोज निकालने चाहिए। अर्जी तो देनी हो चाहिए, किन्तु उसके पीछे बल चाहिए। वह बल सत्याग्रह से प्राप्त होता है । किन्तु सत्याग्रह तो वही व्यक्ति कर सकता है, जिसने सत्यको जान लिया है। यदि हम सत्यको जानकर उसके मुताबिक आचरण करते हों, तो उपर्युक्त दुःख हो ही नहीं सकता । तो प्रश्न यह है कि सत्याग्रहकी लड़ाई कैसे लड़ी जाये। उत्तर यह है कि सत्याग्रहकी लड़ाई लड़नेका अर्थ यह है कि हम धीरे-धीरे सत्य ग्रहण करते रहें । जिस हद तक हम उसे ग्रहण करेंगे, उस हद तक [ हमारे ] दुःखका नाश होगा । प्रत्येक विषयपर सत्याग्रह किस प्रकार किया जा सकता है, इसपर बादमें विचार करेंगे । [ गुजराती से ] इंडियन ओपिनियन, १०-१०-१९०८
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