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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/१७६

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८९. मेरा जेलका दूसरा अनुभव [२] काम सख्त सजा पाये हुए कैदियोंसे सरकारको हर रोज नौ घंटे काम लेनेका अधिकार है । कैदियों को हमेशा शामके छः बजे कोठरियोंमें बन्द कर दिया जाता है। सुबह साढ़े पाँच बजे उठनेकी घंटी बजती है और छः बजे कोठरीका दरवाजा खोला जाता है । कोठरी में बन्द करते समय और कोठरी से निकालते समय कैदियोंकी गिनती की जाती है। गिनती विधिपूर्वक और जल्दी हो सके, इसलिए कैदियोंको अपने-अपने बिस्तरके पास सावधानी से खड़े रहनेका हुक्म होता है । हरएक कैदीको अपना बिस्तर लपेटकर उचित स्थानपर रखकर तथा हाथ-मुँह धोकर छः बजेसे पहले तैयार हो जाना पड़ता है और सात बजे अपने काममें लग जाना होता है। काम कई प्रकारके करने होते हैं। पहले दिन हमें आम रास्तेके पास जो खुली जमीन है उसे खोदनेके लिए ले जाया गया था, ताकि उसमें बुवाई की जा सके।' लगभग तीस भारतीय कैदियोंको ले गये थे। जिनकी हालत काम करने लायक नहीं थी, उनका जाना जरूरी नहीं था । हमें काफिरोंके साथ ले गये थे । जमीन बहुत कड़ी थी और उसे कुदालीसे खोदना था, इसलिए काम सख्त था । धूप तेज पड़ रही थी । काम करनेकी जगह जेलसे करीब डेढ़ मील दूर रही होगी। हम सब भारतीय कैदी काममें उत्साह से जुट गये । लेकिन कामकी आदत बहुत कम लोगोंको थी । इसलिए सभी बहुत ज्यादा थक गये । काम करनेवालोंमें बाबू तालवन्तसिंहका लड़का रविकृष्ण भी था । उसे काम करते देखकर मुझे बहुत परेशानी हो रही थी। लेकिन उसकी मेहनत देखकर में खुश हो रहा था । दिन ज्यों- ज्यों चढ़ता गया त्यों-त्यों कामका बोझ ज्यादा भारी होता गया । सन्तरी बहुत तेज स्वभाव का था । " चलाओ, चलाओ " की पुकार लगाता रहता था । उसकी यह पुकार सुनकर भारतीय कैदी घबड़ा जाते थे । कुछको मैंने रोते हुए भी देखा । एक आदमीका पाँव सूजा हुआ देखा । यह सब देखकर मेरा दिल रोता था । फिर भी मैं सबसे कहता था कि सन्तरी क्या कहता है, उसकी परवाह किये बिना सबको अपना काम सच्चे दिलसे करते जाना चाहिए । मैं खुद भी थक गया। हाथमें बड़े-बड़े छाले उठ आये। उनसे पानी झरने लगा। कमर झुकाना मुश्किल मालूम होता था, और कुदालीका वजन मन-भर जैसा लगता था । मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करता रहता था कि मेरी लाज रख; मुझे अशक्त न बना; और मुझे इतनी ताकत दे कि मैं अपना काम बराबर करता रहूँ। इस तरह ईश्वरपर भरोसा रखकर मैं अपना काम करता जाता था । लेकिन में सुस्ताने के लिए जरा रुका, तो सन्तरी मुझे डाँटने- फटकारने लगा। मैंने उससे कहा, डांट-फटकारकी जरूरत नहीं है, मुझसे जितनी कड़ी मेहनत हो सकेगी, मैं करूँगा । इसी समय श्री झीणाभाई देसाईको मैंने मूर्च्छित होते देखा । अपनी जगह से मैं हट नहीं सकता था, इसलिए कुछ देर तक मैं रुका रहा । सन्तरी वहाँ गया । मैंने देखा कि मुझे जाना ही चाहिए, इसलिए मैं दौड़ा। दूसरे दो भारतीय साथी भी १. बादमें यह एक विवादका विषय बन गया; देखिए परिशिष्ट ७।