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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/१८०

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९१. नेटालमें भारतीयोंकी शिक्षा उच्चतर भारतीय विद्यालयों (हायर ग्रेड इंडियन स्कूलों) में सरकार अब १४ वर्ष से ज्यादा उम्र के लड़कोंको नहीं जाने देगी, इस विषयपर हम गत सप्ताह लिख चुके हैं।' इस सम्बन्ध में जो उपाय करने हों, फौरन किये जाने चाहिए। ज्यादा छानबीन करनेपर ऐसा मालूम होता है कि मुकदमा दो तरह से लड़ा जा सकता है। एक तो अधिक उम्र के लड़कोंको दाखिल न करनेके निर्णयके खिलाफ और दूसरे, भारतीय लड़कोंको अंग्रेजी स्कूलोंमें दाखिल करानेके लिए। दूसरे प्रकारके मुकदमे में शायद जीत हो सकती है। पहले मुकदमे में जीतकी सम्भावना कम है । फिर भी वह लड़ने लायक है । उसमें सरकारकी पोल खुलेगी। दूसरा मुकदमा चलाकर लड़कों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजने की जरूरत नहीं है, किन्तु यदि उसमें हमारी जीत हो तो उन्हें उच्चतर विद्यालयों में ज्यादा सुविधाएँ मिल सकेंगी। ये दोनों ही प्रकारके मुकदमे लड़नेके लिए पैसेकी जरूरत है । भारतीय माँ-बाप पैसा निकालें तो कुछ बन सकता है। [ गुजरातीसे ] इंडियन ओपिनियन, १६-१-१९०९ ९२. प्रवासी आयोग -- नेटालके प्रवासी आयोग (इमिग्रेशन कमिशन) की बैठक मंगलवारसे डर्बनमें आरम्भ हुई हैं । इसमें जिसको गवाही देनी हो वह दे सकता है। कांग्रेसका कर्तव्य है कि वह इस सम्बन्धमें गवाही दे । इसके अलावा लोग निजी हैसियत से भी गवाहियाँ दे सकते हैं । हमारे विचारसे भारतीय तो एक ही प्रकारकी गवाही दे सकते हैं; और वह है गिरमिटकी प्रथा बन्द करनेके पक्षमें। गिरमिट और गुलामीमें बहुत फर्क नहीं है । हम लोग मान लेते हैं कि गिरमिट में आनेवाले भारतीयों को कुछ लाभ हुआ है। किन्तु आर्थिक फायदा उठाकर वे गुलाम बने, यह तो नुकसान ही माना जायेगा । जो लोग इस तरहकी गुलामी भोगते हैं वे तो देशके लिए गये- गुज़रे ही हैं। उनकी गुलामी से देशको कोई लाभ नहीं होता। जबतक मनुष्य स्वतन्त्र होकर काम न कर सके तबतक उसके कामका लाभ जातिको मिलता ही नहीं। दूसरे कारणोंपर विचार करें तो भी, गिरमिट प्रथाको बन्द करना ही उचित है। इसलिए इस तरहकी गवाही आयोगके सामने पेश की जानी चहिए । [ गुजराती से ] इंडियन ओपिनियन, १६-१-१९०९ १. देखिए " उच्चतर विद्यालय ", पृष्ठ १४१ ।