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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/१८३

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मेरा जेलका दूसरा अनुभव [३] १४९ इसी कारण से हम महामारियाँ पैदा करते हैं या फैलाते हैं। हम ऐसा मान बैठे हैं कि पाखाने तो हमेशा गन्दे ही होते हैं । इसलिए हमपर बार-बार गन्दगीका आरोप लगाया जाता है । ऐसा काम न करनेके कारण ही एक भारतीय कैदी को "सॉलीटरी सेल" यानी कालकोठरीमें बन्द होने की सजा भोगनी पड़ी थी। सजा भोगने में मैं दोष नहीं मानता; लेकिन यह सजा भोगनेको जरूरत नहीं थी । इसके सिवा, हम ऐसे काम में आनाकानी करके पीछे हटे, यह उचित नहीं है । जब मैं इस कामके लिए जाने लगा तब सन्तरीने दूसरोंको उलाहना देते हुए उन्हें भी उस काम के लिए चलनेको कहा। इस तरह इस हुक्मकी बात फैल गई और तुरन्त ही श्री उमर उस्मान तथा श्री रुस्तमजी मेरी मदद के लिए दौड़ पड़े, यद्यपि काम बहुत कम था । इस बातको लिखनेका हेतु यह दिखाना है कि जब सरकारने उनसे ऐसा काम कराया, तो उसे करने में उन्होंने भी अपना सम्मान माना । यदि हम, जेलमें जो काम हमें मिलता है, उसके प्रति घृणाका भाव रखें, तो हम खरी लड़ाईमें हिस्सा नहीं ले सकते । जोहानिसबर्ग ले गये वहाँ फोक्स रस्ट जेल में हमें कैसा काम करना पड़ता था, उसका विवरण मैंने ऊपर दे दिया । लेकिन मेरे पूरे दो माह उसो जेलमें नहीं बोते । मुझे कुछ दिनोंके लिए अचानक जोहानिसबर्ग भेज दिया गया था । वहाँ जो कुछ हुआ, वह जानने लायक है। अक्तूबर २५ को मुझे ले जाया गया। इसका कारण यह था कि मुझे दर्जी डाह्याभाईके मुकदमेमें गवाही देनी थी। इसके सिवा दूसरे कारणोंकी सम्भावनाके बारेमें भी काफी तर्क-वितर्क हुआ। बहुत-से लोग ऐसी भी आशा करते थे कि शायद श्री स्मट्ससे मुलाकात होगी। पीछे मालूम हुआ कि ऐसी कोई बात नहीं थी। मुझे ले जाने के लिए जोहानिसबर्ग से एक खास दारोगाको भेजा गया था। इस दारोगाको और मुझे रेलका एक डिब्बा मिला था। टिकट दूसरे दर्जेका था, उसका कारण तो यह था कि उस गाड़ी में तीसरे दर्जे के डिब्बे थे ही नहीं। ऐसा मालूम होता है कि कैदियोंको तीसरे दर्जे में ही ले जाते हैं। रास्ते में भी मेरी पोशाक कैदीकी ही थी। मेरा सामान मुझसे ही उठवाया गया । जेलसे स्टेशन तक चलकर जाना था। जोहानिसबर्ग पहुँचने के बाद वहाँसे जेल तक सामान उठाकर पैदल जाना पड़ा । इस बातकी अखबारोंमें बहुत टोका हुई । विलायतकी संसद में भी इस प्रसंगको लेकर सवाल पूछे गये। कई लोगोंको बहुत दुःख हुआ । सबको ऐसा लगा कि मुझ जैसे राजनीतिक कैदीको जेलकी पोशाक में पैदल बोझा उठवाकर नहीं ले जाना चाहिए था।' लोगोंका मन इस घटना से दुखे, यह बात समझमें आने-जैसी है । जब श्री आंगलियाने सुना कि मुझे इस तरह जाना है तब उनकी आँखोंमें आँसू भर आये । श्री नायडू तथा श्री पोलकको इसकी खबर मिल गई थी, इसलिए वे मुझसे स्टेशनपर मिले। वे भी मेरी स्थिति देखकर रुआँसे हो गये, लेकिन इसमें दुःख माननेका कोई कारण नहीं है । इस देशमें राजनीतिक और दूसरे कैदियोंके बीच सरकार कोई फर्क रखें, यह सम्भव नहीं है। वह हमें जितना ज्यादा दु:ख दे और हम उसे जितना ज्यादा सहें, उतनी ही जल्दी हमारा छुटकारा होगा । इसके सिवा, विचार करनेसे मालूम होगा कि कैदीकी पोशाक पहनना, पैदल चलकर जाना और अपने सामानका बोझ उठाना - इस सबमें दुःखकी कोई बात नहीं है । लेकिन दुनिया १. देखिए परिशिष्ट ८ ।