१५४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय बुरा करना चाहते हैं वे अज्ञानी हैं, ऐसा समझकर उनपर हमें तरस खाना चाहिए । किन्तु हमें उनसे दबना नहीं है । यह लड़ाई लम्बी हो गई है -- अभी और लम्बी होगी। सभी लोग समझ सकते हैं कि लड़ाई लम्बी हुई है, इसके कारण हम ही हैं । अब इसे छोटा करना भी हमारे ही हाथमें है । इसका उपाय यही है कि जो लोग लड़ाईको समझते हैं उन्हें पूरा उत्साह दिखाना चाहिए। उनको रोषमें आना या घबराना नहीं है । फिर, ज्यों-ज्यों हमारे विरुद्ध जोर लगाया जाये, त्यों-त्यों हमें ज्यादा जोर लगाना चाहिए। जो लोग लड़ाईको इस रूप में समझते हैं, उनको ज्यादा नुकसान उठाना और ज्यादा कष्ट सहना है । लड़ाईका सच्चा मुद्दा यह है कि हमें अपनी जान खोकर, अपना माल गँवाकर भी खुश रहना है; और यह सब निर्भीक भावसे करना है । इसीमें अपना भी और अपनी कौमका भी लाभ समझना है । ऐसा होगा, तभी लड़ाई जीती जायेगी । श्री पोलकपर जो चोट की गई है वह हम सभीको लजानेवाली है। श्री पोलकने भारतीय समाजकी जो सेवा की है, उसका मूल्य आँकना मेरे लिए तो सम्भव नहीं है । मैं उनके गुणोंका वर्णन नहीं कर सकता। वे हमारी लड़ाईके तत्त्वको जितना समझते हैं, उतना शायद हो कोई भारतीय समझता हो। ऐसे व्यक्तिके विरुद्ध ऊपर बताये गये पत्रमें जो कुछ लिखा गया है, वह बताता है कि हमारी ग्रह-दशा कठिन है । मैं उस पत्रको लिखाने वाले और लिखनेवालेको नहीं जानता। मैं तो ईश्वरसे यही प्रार्थना करता हूँ कि वह उसको, पठानोंको और समस्त भारतीयोंको सद्बुद्धि दे और भारतीय समाजने अपने सिरपर जो बड़ा काम लिया है, उसमें वह अन्ततक मजबूत रहे । [ गुजराती से ] इंडियन ओपिनियन, २३-१-१९०९ ९६. पत्र : अखबारों को ' जातिका सेवक और सत्याग्रही, मोहनदास करमचन्द गांधी [ महोदय, ] । जोहानिसबर्ग जनवरी २०, १९०९ 1 भारतीय समाज पिछले ढाई सालसे चलती आ रही अपनी लड़ाईके तीसरे और शायद अन्तिम दौर में प्रवेश कर रहा है । अभीतक इस बातकी जरूरत महसूस नहीं हुई थी कि ब्रिटिश भारतीय व्यापारी अपना माल-मता पूरी तरहसे होम दें और अपनेको कंगाल बना डालें । लड़ाई में भाग लेनेके लिए अपनेको मुक्त करनेकी दृष्टिसे उन्होंने अपना व्यापार काफी हद तक कम तो किया है, किन्तु उसे पूरी तरह से छोड़ा नहीं है । यह कथन कि किसी अन्यायी सरकारके अधीन केवल वे लोग ही धनका संग्रह या उसकी रक्षा कर सकते हैं, जो उसके अन्यायका १. यह २३-१-१९०९ के इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित हुआ था। गांधीजी काछलियाके साहूकारोंकी २२ जनवरीको हुई सभामें हाजिर थे और अनुमान है, इस पत्रका मसविदा उन्होंने ही तैयार किया था । देखिए "पत्र : रैंड डेली मेल' फो", पृष्ठ १५९-६० भी । Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/१८८
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