भेंट : ' नेटाल मर्क्युरी' के प्रतिनिधिको १५७ कानूनों का विरोध करनेका अधिकार है, जिन्हें वे अपने राष्ट्रीय सम्मान और अपनी अन्तरात्माके प्रतिकूल समझते हैं। इस स्थितिमें, जबतक संघर्ष चलता है, मेरे सामने इसके सिवा और कोई रास्ता खुला नहीं रहा है कि मेरे पास जो कुछ है उसको बिकने देनेके बजाय मैं अपने लेनदारोंको सौंप दूं, क्योंकि आखिर में उनकी ओरसे इसका न्यासी (ट्रस्टी) हूँ। मैं जानता हूँ कि मुझे अपने-आपको इस मालको रकममें बदलने और अपने लेनदारोंका पावना नकद में चुकानेके लिए जिम्मेदार समझना चाहिए। परन्तु सार्वजनिक हित मेरे निजी हितसे ज्यादा जरूरी है । इसलिए यह देखते हुए कि मैं अपने मालको इस तरह नीलाम नहीं कर सकता जिससे मेरे लेनदारोंको लाभ हो, मैंने यही तय किया है कि मैं उनको इकट्ठा करूँ, उनके सामने अपनी हालत रखूं और उनसे कहूँ कि वे मेरे माल और दूसरी मिल्कियतको ले लें। अगर संघर्ष सौभाग्यसे निकट भविष्यमें समाप्त हो जाये - या जब भी समाप्त हो - तो में इस मालको खुशी से ज्योंका-त्यों ले लूंगा और अपने लेनदारोंके लाभके लिए बेचूँगा । परन्तु अपने मालकी बिक्रीके बारेमें में आगामी बैठकमें अपने-आपको पूरी तरह अपने लेनदारोंके हाथोंमें सौंप दूंगा । [अंग्रेजीसे] इंडियन ओपिनियन, २३-१-१९०९ ९८. भेंट : 'नेटाल मर्क्युरी' के प्रतिनिधिको 11 [ जोहानिसबर्ग जनवरी २१, १९०९] मुलाकात में श्री गांधीने कहा इस कदमके कारण भारतीय कौमको इतना अधिक आत्म-त्याग करना पड़ेगा कि सब भारतीय व्यापारी इस विचारको जो मुझे नेटालमें रहते सूझा था -- अपनानेके लिए तैयार होंगे या नहीं, यह अभी शुरूकी हालतमें बताना मुश्किल है । भारतीयोंके लेनदारोंमें समुद्र पारीय ब्रिटिश पेढ़ियाँ, स्थानीय थोक और खुदरा व्यापार करनेवाली पेढ़ियाँ, बैंक, दूकानदार और भारतकी पेढ़ियाँ हैं। अगर भारतीय एकमत हो सकें तो इनका नुकसान कई हजार पौंड तक पहुँच जायेगा । इंग्लैंडकी थोक व्यापारी पेढ़ियोंने यहाँ भारतीय व्यापारियों को बहुत माल दिया है । अगर यहाँके भारतीय अपनी जायदादें और दूकानें उनको सौंप दें तो यहाँके थोक व्यापारियोंको या तो इस नुकसानके व्यापारको बन्द करनेके लिए मजबूर होना पड़ेगा या एशियाई दूकानदारोंको मैनेजरों या मुनीमोंके रूपमें रखना पड़ेगा, ताकि वे रजिस्ट्रेशन-कानूनोंके बावजूद व्यापार कर सकें। अगर किसी भी तरहके लेनदारोंने भारतीयोंके मालको सरेबाजार बिकवानेका फैसला किया तो भारतीय व्यापारी तो बिल्कुल बर्बाद हो ही जायेंगे, परन्तु उन लेनदारोंको भी भारी नुकसान होगा । श्री गांधीने कहा कि २. यह सुझाव दिया गया था कि साहूकारोंका जो भी माल भारतीयोंके पास हो वे उसे वापस कर दें या अपनी दूकानें बन्द कर दें । देखिए " पत्र : अखबारोंको", पृष्ठ १५४-५६ । Gandhi Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/१९१
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