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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/१९५

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लड़ाईका अर्थ क्या है ? १६१ इस लड़ाईका मुख्य हेतु तो यह है कि हम मर्द बनें, एक जाति बनना सीखें, आज जो हम बकरे बने हुए हैं, इस स्थिति से निकलकर शेर बनें, और दुनियाको दिखा दें कि हम एक हैं, हम भारतके सपूत हैं और उसके लिए मिटने को तैयार हैं। महान थोरो कह गये हैं कि एक खरा आदमी एक लाख खोटे लोगोंसे बढ़कर है । हममें से कितने खरे हैं, यह हम जानना चाहते हैं । यह बात इस लड़ाईमें मालूम हो जायेगी । खरा होना सीख लेना कानूनको तोड़नसे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है । दूसरोंको झुकते देखकर खुद भी हिम्मत हार बैठना बुरा है । यही नामर्दी है । गोरी जातियाँ हमपर यह आक्षेप करती हैं कि हम आरम्भ में तो बहादुरी दिखाते हैं, लेकिन समय आनेपर ढीले पड़ जाते हैं । हम यह सिद्ध कर देना चाहते हैं कि ऐसी कोई बात नहीं है । हमें ट्रान्सवालकी शक्तिशाली सरकार मोम नहीं बता सकती । यही सोखना सच्चा धर्म है और इसीलिए हम इस धर्म-युद्ध में अपने प्राण अर्पण करने को तैयार हैं। यह बात बता देना इस लड़ाईका एक अंग है । और यही मुख्य अंग है । शेष तो उसके जरिये खुद ही हमारे हाथ आ जायेगा । ऐसी महान विजय प्राप्त करनेके लिए महान पराक्रमको आवश्यकता है। सो किस । प्रकार आये ? ट्रान्सवालमें दूकानदार बड़े से बड़े भारतीय हैं। उन्हें अपनी योग्यताका परिचय देना है, और इसके लिए उन्हें भिखारी बनना है । भिखारी बनने में ही उनका तथा जातिका हित है। जिस राज्य में राजा अत्याचारी होता है उस राज्यमें अत्याचारमें भाग लेनेवाली प्रजा ही सुखी या पैसेवाली हो सकती है। लुटेरे राज्यमें अच्छे आदमी पैसा इकट्ठा नहीं कर सकते। ऐसे राज्यमें सीधे लोग तो केवल दुःख सह कर ही रह सकते हैं । आज ट्रान्सवालके भारतीयोंकी दशा ऐसी ही है । ट्रान्सवालकी सरकार भारतीयोंकी मान-मर्यादा और सम्पत्ति लूट लेना चाहती है। उसे भारतीय कैसे लुट जाने देंगे ? पुराने जमाने में लोग जब कभी अत्याचारी सरकारके विरुद्ध लड़ते थे तब वे अपनी स्त्रियोंकी मान-मर्यादा बचानेके लिए पहले उन्हें मार डालते थे। ट्रान्सवालके भारतीय आज सत्याग्रहकी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्हें अपने धनको उन्हीं स्त्रियोंकी तरह कुर्बान करना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी लाज जायेगी और उनका धन तो कड़वा विष बन जायेगा। किसी भी धर्ममें परमेश्वर और पैसा, दोनोंकी पूजा एक साथ [ सम्भव ] नहीं मानी गई। सभी धर्म सिखाते हैं कि यदि ईश्वरकी उपासना करनी है तो धनको तिलांजलि देनी पड़ेगी। यदि हमने यह लड़ाई ईश्वरका स्मरण करके और उसपर विश्वास रखकर छेड़ी है तो फिर धनका त्याग करना ही होगा। जब हमें धनकी आवश्यकता पड़ेगी, तब वही ईश्वर हमारे पास धन भेज देगा । इटलीमें अपनी सम्पत्ति-सहित दबकर तीन लाख व्यक्ति मर गये, यह ईश्वरकी लीला है । इसे ध्यान में रखकर हमें सदा अपनी मान-मर्यादाकी रक्षा करनी चाहिए। मान-रक्षा अपने हाथकी बात है; धनकी रक्षा अपने हाथमें नहीं है । आशा है, भारतीय धनका त्याग करके मानकी रक्षा करेंगे । [ गुजराती से ] इंडियन ओपिनियन, २३-१-१९०९ ९-११