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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/२१०

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१७६ सम्पूर्ण गांधी वाङमय इस पत्रको सम्हालकर रखना । इसे बार-बार पढ़ना । जो बात समझ में न आये वह मुझसे पूछना । तुम दोनों ही इसे पढ़ना । इसे लिखनेका हेतु तुम्हारा कल्याण है, जिसके लिए मैं बराबर तत्पर हूँ । किन्तु मेरे विचारोंको तुम्हें मानना ही चाहिए, यह आग्रह नहीं है । मेरी इच्छा यह है कि तुम दोनों अपने स्वतन्त्र बलसे बढ़ो । मोहनदासके आशीर्वाद गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मूल गुजराती प्रतिको फोटो नकल (एस० एन० ९५२७) से । ११०. पत्र : मगनलाल गांधीको [ फोक्सरस्ट ] जनवरी २९, १९०९ चि० मगनलाल, तुम्हारा पत्र मिला । तुम मुझे जो कुछ विशेष बातें लिखनेवाले हो, मेरे जेल पहुँचने से पहले हो लिख भेजो। मेरो जमानतकी अवधि चौथी तारीखको खत्म हो जायेगी, यह ध्यानमें रखना । कमरुद्दीन सेठसे मिलते रहना। इसमें लाभ हो है । "रसरी आवत-जाततें, सिलपर परत निसान ।" मेरा उत्साह ऐसा है कि हो सकता है, मुझे दक्षिण आफ्रिकामें अपने ही भाइयोंके हाथों मौत भोगनी पड़े। ऐसा हो, तो तुम्हें हर्षित होना चाहिए। इससे हिन्दू और मुसलमान एक हो जायेंगे । इस लड़ाईमें दो प्रकारके आन्तरिक संघर्ष भी चल रहे हैं। इनमें से एक हिन्दुओं और मुसलमानों को संगठित करनेका । उसके विरुद्ध जातिके शत्रु प्रयत्न करते ही रहते हैं । ऐसे महान् प्रयत्नम किसीको तो शारीरिक बलिदान देना ही पड़ेगा । वह बलिदान मैं ही दूं तो मेरी मान्यता है, मैं सौभाग्यशाली हूँगा और मेरे साथी तथा तुम सब भी सौभाग्यशाली होओगे । मैंने तुम्हें श्री सुब्रह्मण्यम से भेंट करनेके लिए लिखा था। वे पादरी हैं। वे मुझे कुल मिलाकर ठीक आदमी जान पड़े हैं । मेरे लिए जो प्रयत्न हो रहा है, वह कौन कर रहा है ? पता लगे तब लिखना । मैं इस सम्बन्धमें फिलहाल तो किसीको नहीं लिखूंगा । मोहनदासके आशीर्वाद गांधीजी स्वाक्षरों में मूल गुजराती प्रतिकी फोटो नकल (एस० एन० ४९१८) से । १. गांधीजी १६ जनवरी, १९०९ को फोक्सरस्टमें गिरफ्तार किये गये थे और स्वयं अपनी जमानतपर छोड़ गये थे । उनके मुकदमेकी सुनवाई ४ फरवरीके बजाय २५ फरवरी, १९०९ को हुई थी और उन्हें तीन महीनेकी सजा दी गई थी । २. क्वीन स्ट्रीट वेलियन इंडियन चर्च, डर्बनके पादरी ।