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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/३३६

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२९८ सम्पूर्ण गांधी वाङमय वक्तव्यकी पाद-टिप्पणी उपर्युक्त विवरण तैयार करनेके बाद प्रतिनिधियोंको एक तार मिला है, जिससे ज्ञात होता है कि नागप्पन नामक एक भारतीय युवक, जिसे गत २१ जूनको संघर्षके सिलसिले में दस दिनका सपरिश्रम कारावास दिया गया था, ३० जूनको मरणासन्न अवस्थामें जेलसे रिहा किया गया और वह ६ जुलाईको चल बसा। तारके अनुसार आरोप ये हैं कि कड़ाकेकी सर्दी पड़ रही थी; जो कम्बल दिये गये थे वे अपर्याप्त थे, वतनी वार्डरोंने पाशविक व्यवहार किया; और चिकित्सा-सम्बन्धी सुविधा उपलब्ध नहीं हुई। उसी तारमें आगे कहा गया है कि दक्षिण आफ्रिकाके एक प्रमुख भारतीय श्री दाउद मुहम्मदको, जिनकी उम्र पचास वर्षसे -- अधिक है और जो छः मासका कारावास भोग रहे थे, बीमारीके कारण छोड़ दिया गया। तारकी तारीख १२ जुलाई है, और अगर उन्हें नागप्पनकी मृत्युके बाद छोड़ा गया हो तो वे पाँच महीनेकी सजा पूरी कर चुके थे । टिप्पणी 'क' बोअर शासनके अधीन एशियाई स्वतन्त्रतापूर्वक गणराज्यमें प्रवेश कर सकते थे, और १८८५ के बाद ३ पौंड देकर वहाँ निवास और व्यापार कर सकते थे । (१८८६ में संशोधित ) १८८५ के कानून ३ द्वारा अपेक्षित "पंजीयन" (रजिस्ट्रेशन) में (रजिस्ट्रेशन) में हुलिया देना शामिल नहीं था । उसमें ३ पौंडी शुल्कका भुगतान करने और भुगतानकी रसीद रखनेकी ही बात थी । एशियाइयोंको नागरिक (बर्गर) के अधिकार नहीं दिये गये थे । एशियाई बस्तियोंको छोड़कर अन्यत्र एशियाई अचल सम्पत्ति नहीं रख सकते थे । ब्रिटिश साम्राज्यमें मिलाये जानेके बाद केवल उन्हीं एशियाइयोंको फिर प्रवेश करने दिया गया है जो यह सिद्ध कर सके हैं कि वे युद्धसे पहले यहाँ रहते थे । लॉर्ड मिलनरकी सलाहके अनुसार एशियाइ- योंने १९०३ में जो “पंजीयन" स्वेच्छासे स्वीकार किया था उसमें पूरा हुलिया देना शामिल था । १९०७ के कानूनके अन्तर्गत पुनः पंजीयन कराना अनिवार्य और तफसीलके लिहाजसे ज्यादा अपमानजनक है। यह आठ बरस और इससे अधिक आयुके सब बच्चों- पर लागू होता है । पुनः पंजीयन न कराने पर जुर्माना, कैद और देश-निकाला हो सकता है । ( १९०८ के कानून ३६ के जरिये अब इसमें परिवर्तन किया जा चुका है ।) एशियाइयोंको, जिनमें ब्रिटिश भारतीय भी शामिल हैं, नगरपालिकाके अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों, दोनोंसे वंचित रखा गया है । यह स्थिति आज भी कायम है । Gandhi Heritage Porta