३३२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय मैंने आज तीसरी बार सभाके सामने वे शर्तें रखीं जिनके बारेमें मैंने उन्हें बताया कि सरकार उन्हें देनेपर तैयार है। मैंने उन्हें यह भी बताया कि यदि उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीयों तथा सोराबजीको बहालीके लिए कोई व्यवस्था इनमें कर दी जाये तो ये ही शर्तें स्वीकार्य समझौतेका रूप ले लेंगी। किन्तु सभा एशियाई अधिनियमको रद करने तथा प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियमको सामान्य धाराके अन्तर्गत उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीयोंको मान्यता देनेसे कम किसी भी बातको सुननेके लिए तैयार नहीं थी । मैं लोगों को अधिकसे-अधिक केवल इसीपर राजी कर सका कि वैधानिक अधिकार मंजूर कर लिया जाये तो शिक्षित भारतीयोंके खिलाफ बरते जानेवाले ऐसे प्रशासनिक भेदभावपर कोई आपत्ति नहीं होगी, जिसके कारण केवल अत्यन्त उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय ही प्रवेश पा सकें।' tt [ सहपत्र २ ] संशोधन १९०७ के प्रवासी प्रतिबन्धक कानून (इमिग्रेशन रिस्ट्रिक्शन ऐक्ट) १५ के खण्ड २ के उपखण्ड १ का एक हिस्सा इस तरह है : कोई भी व्यक्ति, जो उपनिवेशमें या उपनिवेशके बाहर, बाकायदा अधिकार- प्राप्त अफसरके कहनेपर अपर्याप्त शिक्षाके कारण इस उपनिवेशमें प्रवेशकी अनुमतिके आवेदनपत्र या ऐसे कागजात, जो वह अफसर माँगे, किसी यूरोपीय भाषाके अक्षरोंमें (बोल- कर लिखानेपर या अपने-आप) न लिख सके या उनपर उक्त अक्षरोंमें हस्ताक्षर न कर सके, व्यवस्थाकी जाती है कि इस उपखण्डके प्रयोजनोंके लिए यीडिश यूरोपीय भाषा मानी जायेगी; यह भी व्यवस्था की जाती है कि" (इसके बाद जो कुछ दिया गया है, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है ।) उपखण्ड १ का प्रस्तावित संशोधन यह था : कोई व्यक्ति जो, उपनिवेशमें या उपनिवेशके बाहर, किसी बाकायदा अधिकार- प्राप्त अफसरके कहनेपर अपर्याप्त शिक्षाके कारण यूरोपीय भाषामें नियत की गई परीक्षा पास न कर सकेगा; व्यवस्था की जाती है कि इस खण्डके प्रयोजनोंके लिए यीडिश यूरोपीय भाषा मानी जायेगी; यह भी व्यवस्थाकी जाती है कि यह परीक्षा कैसी हो, यह प्रवासी अधिकारी पूरी तरह अपनी मर्जीसे तय कर सकेगा। यह परीक्षा व्यक्तियों या वर्गोंके लिए अलग-अलग हो सकती है। उसके सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालयमें या उपनिवेशकी किसी अदालतमें अपील न की जा सकेगी। यह भी व्यवस्थाकी जाती है कि किसी ऐसे एशियाईपर, जो प्रवासी अधिकारी द्वारा ली गई इस परीक्षामें पास हो जायेगा और दूसरी तरहसे इस कानूनके अन्तर्गत निषिद्ध प्रवासी न होगा, १९०८ के कानून ३६ की धाराए लागू न होंगी; यह भी व्यवस्था की जाती है । १. लॉड ऍम्टहिलने इस ७ अगस्तको इस पत्रकी प्राति स्वीकार करते हुए लिखा था कि यह प्रलेख उन्हें ठीक जान पड़ा है और वे उसको तत्काल ही काममें ला सकेंगे ।
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/३७०
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