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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 9.pdf/५२७

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लन्दन ४८९ तब स्थानीय पुलिस अधिकारियोंको सब मुख्य मार्ग बन्द कर देने पड़ते हैं और आसपासके शहरोंसे पुलिसके बहुत-से पैदल और घुड़सवार सिपाही बुलाने पड़ते हैं । जो लोग सभामें जाना चाहते हैं, उन्हें सभाकी जगहसे एक-दो गली पहले ही अपने टिकट दिखाने पड़ते हैं । अन्तमें वे तंग गलियोंमें होकर ही सभामें पहुँचते हैं । वहाँ जानेवालोंमें अगर किसीपर शक हो जाये तो उसे अपना नाम-धाम भी बताना पड़ता है । इस सब इन्तजाम में बहुत पैसा खर्च होता है । - -- ऐसा जोश ये स्त्रियाँ दिखा रही हैं । ये घड़ी-भर दम लेनेके लिए भी नहीं बैठतीं। उनका विरोध लाखों स्त्रियां करती हैं। वे उन्हें उनके विरोधका इतना ही उत्तर देती हैं, आप अपना हित नहीं समझतीं । हम आपके लिए लड़ेंगी। आप मदद न करें तो हमें फिक्र नहीं है।" इसके अलावा, उन्होंने सरकारको इस आशयकी चिट्ठी लिखी कि अगर सरकार योग्य स्त्रियोंको मताधिकार दे दे तो जो स्त्रियाँ जेलमें हैं, वे उपद्रव किये बिना अपनी सजाएँ भुगत लेंगी। वे अपने लिए मताधिकार भी न मांगेंगी। ऐसी वीर स्त्रियाँ कभी नहीं हारेंगी। उनका स्वार्थ नहीं है, यह तो स्पष्ट है। मारपीट हो, धन जाये और लोग लज्जित करें • चाहे जो हो उससे वे डरती नहीं हैं । इस दुनियामें अधिकार प्राप्त करनेका सुगम मार्ग कहीं भी नहीं है। ये स्त्रियाँ स्वयं ही उपद्रव करके अपनी ऐसी अच्छी लड़ाईको बट्टा लगा रही हैं । उन्हें अन्तमें अपनी करनी पार उतरनी होगी । यहाँके लोग शरीर-बलसे डर जाते हैं और शरीर बलकी पूजा करते हैं, इसलिए स्त्रियाँ मताधिकार तो ले लेंगी, किन्तु वे मताधिकार लेकर वही अन्याय स्वयं भी करेंगी, जिसका वे विरोध कर रही हैं। इसलिए लोगोंकी हालत जैसीकी-तैसी रहेगी । यदि ये केवल सत्याग्रहके द्वारा लड़तीं तो सारे इंग्लैंडकी हालतको बदल सकती थीं। साथ ही उनका प्रभाव दुनिया-भर में पड़ा होता । वे शरीर-बलको आजमाती हैं । इसमें अन्तमें स्वार्थं आ खड़ा होगा । हमें उनसे शरीर बलका आश्रय त्यागनेकी शिक्षा लेनी है और उनकी कष्ट- सहनकी वीरताका अनुकरण करना है। इसके अलावा, हमें यह भी देखना है कि अंग्रेज लोग ऐसे हैं, जो अपनी स्त्रियोंको भी कसौटी पर कसे बिना अधिकार नहीं देते । चोटके बदले चोट मैंने बम्बईके 'गुजराती' नामक पत्रमें दो अत्यन्त सुन्दर कविताएँ पढ़ी हैं; उनमें से एकमें कविने अनजाने ही सत्याग्रहकी तसवीर खींच दी है । वह कविता इस प्रकार है : जबतक दीपक नहीं जलता तबतक पतंगा कहाँ गिरकर जलेगा ! हमें जलानेका प्रयत्न करनेसे पहले तुम्हें जलना पड़ेगा ! १. मूल गुजराती कविता इस प्रकार है : बळे दीवो न ज्यां सुधी पतंगो क्यों पडी बळशे ? हमोने बाळवा जाती प्रथम बळ तुने पडशे । तुम्हारे और हमारे बीच शरीर और जीवका सम्बन्ध है, तुम जबतक अपने ऊपर चोट न करोगे तबतक हमें चोट न लगेगी। सम्बन्ध शरीर-जीवनो ते तमारा ने हमारामां, न करशो घाव निजपर त्यां सुधी हमने नहीं अडशे ।