सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
प्रश्न : ट्रान्सवाल की भारतीय बस्ती का इतिहास क्या है?
उत्तर : १८४३ से गिरमिटिया मजदूरी की प्रथा पहले नेटाल में शुरू हुई। बाद में वह समाप्त कर दी गई। तब उपनिवेश की समृद्धि में गिरावट आने लगी थी। १८५३ में वह प्रथा फिर शुरू की गई। मारीशस में भारतीयों की एक बड़ी बस्ती थी। वहाँ से बम्बई का एक भारतीय यह सुनकर कि नेटाल में भारतीय बड़े मजे में है, भारी संख्या में अपने सम्बन्धियों और जाति-बन्धुओं को लेकर नेटाल आ पहुँचा और वह धनी बन गया। जब अन्य भारतीयों ने यह सुना तो वे भी वहाँ पहुँच गये और इस प्रकार भारतीय व्यापारियों की संख्या बढ़ती गई। जब ट्रान्सवाल की खानों में काम होने लगा तो ये व्यापारी नेटाल से यहाँ आ गये और जल्दी समृद्धशाली हो गये। उन्होंने देखा कि वे सिर्फ अपने देशवासियों के साथ ही नहीं, बल्कि काफिरों और डच लोगों के साथ भी व्यापार कर सकते हैं उन्हें उन लोगों के साथ व्यापार करने में विशेष लाभ नजर आया और इस प्रकार भारतीय व्यापारियों की संख्या बढ़ती गई।
प्रश्न : मैंने लोगों को यह कहते सुना है कि आपने भारतीय व्यापारियों की संख्या बढ़ाने और भारतीय कारीगरों को यहाँ लाने की खास तौर से कोशिश की है। क्या सच है?
उत्तर : इसमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है। मैं इस देश में पहली बार १८९३ में आया था तब चीजें बहुत कुछ वैसी ही थीं जैसी कि आज हैं। उस समय देश में पूरे आठ या नौ हजार भारतीय थे। तब से आज तक उनकी संख्या में बहुत कम वृद्धि हुई है। मैंने समाज की संख्या बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया।
प्रश्न : हाल का पंजीयन कानून लागू होने के पहले पंजीयन का कौन-सा तरीका अपनाया जाता था?
उत्तर : आज के जैसा कोई पंजीयन पहले नहीं किया जाता था। १८८५ में डच सरकार ने आव्रजन से सम्बन्धित एक कानून[१] पास किया था। वह कानून भारतीय व्यापारियों के आव्रजन को रोकने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया था, बल्कि उसका मकसद उनके व्यापार पर रोक लगाना था। एक समय तो राष्ट्रपति क्रगर ने इस देश में व्यापार करने के इच्छुक प्रत्येक भारतीय पर २५ पौण्ड का निषेधात्मक शुल्क लगाने वाला कानून पास किया था। उस कानून की तकनीकी शब्दावली यह थी कि व्यापार करने के इच्छुक हर भारतीय को पंजीयन करवाकर २५ पौण्ड की रसीद लेनी चाहिए। ब्रिटिश सरकार के अभिवेदन पर शुल्क की यह रकम घटाकर ३ पौंड कर दी गई थी। देखा जाये तो इस कानून के जरिये केवल भारतीय व्यापारियों पर व्यापार कर लगाया गया था। यह भारतीय समाज पर एक वर्ग के रूप में लागू होनेवाला पंजीयन अधिनियम नहीं था।
- ↑ १८८५ का कानून ३
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