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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/११२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्‌मय

स्वीकार करता हूँ कि अनुमतिपत्र के मामले में कुछ गैर-कानूनी कारोबार चल रहा था, मगर उसके पीछे उसकी व्यवस्था करने और उससे लाभ उठाने वाले सरकारी अफसरों का हाथ था। वास्तविक तथ्य ये हैं—[युद्ध की] शान्ति होने के बाद यूरोपीय वालंटियर बड़ी संख्या में सरकार में सम्मिलित कर लिये गये और उन्हें विश्वास तथा जिम्मेदारी के पद प्रदान किये गये। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कई लोग उन पदों के लिए, जिनके बारे में उन्हें पहले कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं हुआ था, पूर्णरूप से अयोग्य सिद्ध हुए। और तो पूरी तरह बेईमान साबित हुए। इस वर्ग के अनेक लोग एशियाइयों के पर्यवेक्षक नियुक्त किये गये। उन्हें बहुत बड़े-बड़े अधिकार प्रदान किये गये और भारतीयों के भाग्य की बागडौर उनके हाथों थी। उन्हें धनवान बनने के लिए अपने पद का पूरा-पूरा फायदा उठाने में जरा भी हिचक न हुई। उन्होंने अनुमति पत्र देने के मामले में अवैध व्यापार चलाने की नियमित प्रथा की शुरूआत की और अनुमति देने या हस्तान्तरित करने के लिए १० से ३० पौंड तक लिये जाते थे। जहाँ हड्डी के टुकड़े पड़े होंगे वहाँ कुत्ते तो इकट्ठे हो ही जाते हैं। जब यह जाहिर हो गया कि कुछ पैसे देकर अनुमति पत्र प्राप्त किये जा सकते हैं तो डर्बन, पोर्ट एलिजाबेथ, केपटाउन तथा अन्य स्थानों से भारतीय ट्रान्सवाल आ गये। उनमें से कई लोगों को ट्रान्सवाल में पुनः प्रवेश करने का पूरा अधिकार था, मगर उन्हें भी अपने अनुमति पत्र खरीदने पड़े।

प्रश्न : मगर आपके समुदाय के प्रतिष्ठित लोगों ने इस अवैध व्यापार को रोकने की कोशिश क्यों नहीं की?

उत्तर : उन्होंने कोशिश की। १९०२ में जब मैं भारत से लौटा तो मैंने देखा कि अवैध व्यापार खूब जोरों से जारी था। तब मैंने अपने देशबन्धुओं को आगाह किया कि यदि अवैध व्यापार बन्द नहीं किया जायेगा तो उसके क्या परिणाम निकलेंगे। उस समय में विशेष रूप से श्री जोसेफ चेम्बरलेन से भेंट करने भारत से आया था। मैंने इस मामले पर सर आर्थर लाले[] का ध्यान आकर्षित किया था, मगर उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दो, क्योंकि उन्हें अपने अधिकारियों पर विश्वास था। इस अवैध कार्य को रोकने के सिलसिले में मैंने उनसे तीन बार भेंट की। तीसरी बार मैंने ऐसे प्रमाण पेश किये कि उन्होंने जाँच करवाई और कानून के तहत दो अफसर बर्खास्त कर दिये गये। सरकार के समक्ष इतने स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किये गये कि दोनों अधिकारियों को सेवामुक्त कर दिया। अवैध व्यापार रोकना जरूरी था मगर यह कार्य हाल ही में बनाये गये कानून के बगैर भी प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता था। इस अपराध के सक्रिय कर्ताधर्ता और उससे लाभउठानेवाले भ्रष्ट सरकारी अफसर थे। उन्हें इस बुराई से निपटने के लिए मौजूदा कानून के तहत जो अधिकार मिले हैं उनका इस्तेमाल करने के बजाय उन्होंने समस्त भारतीय समाज के खिलाफ अधिनियम पेश कर दिया।

  1. तत्कालीन लेफ्टिनेंट-गवर्नर

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