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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/१५४

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११०. प्रस्तावना[]

सत्याग्रह आश्रम
अहमदाबाद
माघ सुदी १०, संवत् १९७३ [१ फरवरी, १९१७]

मैं इस प्रयास में भाई करसनदास की सफलता चाहता हूं। करसनदास चितालिया के मन में खाते–पीते, सोते–जागते, उठते बैठते भगिनी समाज ही बसा रहता है। स्त्री–सेवा में देश–सेवा है और भगिनी समाज के समाज द्वारा स्त्री–सेवा की जा सकती हैं, ऐसी उनकी मान्यता है। इसलिए भाई करसनदास भगिनी समाज की आत्मा हो गये हैं। ऐसा करते हुए हिन्द सेवक समाज में की गई अपनी प्रतिज्ञा का पूरा–पूरा पालन कर रहे हैं, ऐसा वे मानते हैं। एक बार मजाक में देवधर ने भाई करसनदास की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि भाई करसनदास को इस रोग से छुड़ाने के लिए कुछ उपाय खोजना पड़ेगा। यह टिप्पणी उनके सम्मान के रूप में की गई थी और वह सम्मान वास्तविक था। जो अपने कार्य के प्रति समर्पित हो सकें, ऐसे पुरुषों की हिन्दुस्तान को जरूरत है। मैं जानता हूं कि करसनदास ऐसे ही पुरुष हैं, इसलिए उनकी प्रस्तावना लिखने की मांग को मैं अस्वीकार नहीं कर सका।

मुझे प्रस्तावना लिखनी ही थी इसलिए भाई भोगीन्द्रराव दिवेटिया की पुस्तक पढ़नी पड़ी। उन्होंने सुन्दर सरल भाषा और संक्षेप में स्त्रियों से सम्बन्धित बहुत–से विषयों की चर्चा की है। उन्होंने अपने विचारों को आग्रहपूर्वक रखने के बजाय सुझाव के रूप मैं रखा है। इसमें भाई दिवेटिया की लेखन–कला और खूबी दिखाई देती है। स्त्रियों के विषय में बल्कि पुरुषों के विषय में भी—स्त्री सामान्य पुस्तकों में लेखक का अपने विचारों का आग्रह पढ़ने में अड़चन डालता है। आशा है पाठकगण मेरे प्रस्तावना लिखने का यह अर्थ नहीं लगायेंगे कि इसमें जो कुछ भी लिखा है उससे मैं पूरी तरह सहमत हूं। भाई दिवेटिया ने अपने विषय को बहुत ही रोचक ढंग से पाठकगण तक पहुंचाया है। उनका यह लेख बहुत लोग पढ़ेंगे, ऐसी आशा कर सकते हैं।

लेखक ने अपने संवादों में पुरुष को अपनी स्त्री के शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। यह यह बहुत वास्तविक लगता है। हम कन्याओं की शिक्षा चाहते हैं। यह शिक्षा किस प्रकार की होनी चाहिए, इस पर अभी खोज हो रही है। अभी तो हम लोग प्रयोग ही कर रहे हैं, लेकिन स्त्री–शिक्षा को केवल कन्या-शिक्षा की दृष्टि से नहीं आंका जायेगा। हजारों कन्याएं १२ वर्ष की उम्र में ही बाल–विवाह की कुप्रथा का शिकार होकर हमारी नजरों से लुप्त हो जाती हैं। वे गृहिणी बन जाती हैं। जब तक इस कुप्रथा का अन्त नहीं होता तब तक पुरुषों को ही स्त्रियों का शिक्षक बनना सीखना होगा। उनकी इस विषय की शिक्षा में हमारी अनेक आशाएं छिपी पड़ी हैं। जब तक स्त्री केवल विषय–भोग की वस्तु रहेगी और रसोई के काम से हटकर हमारी सहचरी के रूप में हमारे सुख–दुःख की भागीदार नहीं बनेगी तब तक हमारे सभी प्रयत्न निष्फल होंगे। कुछ पुरुष अपनी स्त्री को पशु के समान मानते हैं। इस स्थिति के लिए संस्कृत के कई श्लोक तथा तुलसीदास का

  1. भोगीन्द्रराव दिवेटिया द्वारा लिखित 'स्त्रियों अणे समाजसेवा' की
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