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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/१६७

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१२४. पत्र : कल्याणजी विट्ठलभाई मेहता को

मोतीहारी
कार्तिक अमावस्या, [१४ दिसम्बर, १९१७][]

मेरे पास कोई भी लेख भेजने के लिए समय नहीं है। बहुत–सा काम वैसे का वैसा पड़ा है। जो लोग मेरी दशा समझते हैं, उनका फर्ज है कि वे मुझ पर और बोझ न डालें। तुम्हें मना नहीं कर सकता इसलिए कुछ भेज रहा हूं। भविष्य में मुझे इससे बचाना और दूसरों को भी मुझ पर बोझ डालने से रोकना। जिस कार्य के लिए वास्तव में मेरी आवश्यकता हो उसमें मुझे लगाकर मेरी सबसे अच्छी सेवा ले सकते हो। जो व्यक्ति एक पैसे की वस्तु के लिए एक रुपया खर्च करे, उस व्यक्ति को क्या उपमा दी जाये? कुछ कामों में मेरी कीमत रुपये जितनी है मैं यह मानता हूं। अभी मेरे पास इस तरह के बहुत से काम हैं। उन्हीं में मैं तल्लीन रहूं, यही आवश्यक है।

मोहनदास के वन्देमातरम्

[गुजराती से]

स्वर्ण जयन्ती अंक, वल्लभ विद्यार्थी आश्रम, सूरत

१२५. पत्र : रामदास गांधी को

मोतीहारी, बिहार
मार्गशीर्ष सुदी ७, २० दिसम्बर, १९१७

चि॰ रामदास,

मैंने तुम्हें पत्र लिखे हैं वे सब मिल गये होंगे। तुम्हें जो कड़वे अनुभव लेने पड़ें वे लो। मुझे तुम पर बहुत विश्वास है। तुम्हारा मन पवित्र है इसलिए तुम कहीं भी फंस नहीं सकते। दर्जी के यहां नौकरी करने में कोई दोष नहीं है। अपनी पवित्रता से उसकी अपवित्रता दूर करो ताकि दर्जी का काम वकील के धन्धे से ज्यादा ऊंचा हो जाये। दर्जी के काम को सीखने के साथ–साथ अगर कपड़े भी बेचने लगो तो उसमें भी कोई दोष नहीं। कताई सीखने के लिए नजर की जरूरत है, एक अच्छे दर्जी के लिए कलात्मक दृष्टि का होना जरूरी है। तुम्हें छूट है कि जो तुम ठीक समझो वही करो। अपना स्वास्थ्य और अपना चरित्र संभालकर रखो इसीमें मुझे सन्तोष होगा। अब मणिलाल की कसौटी होगी। तुम यदि उसकी सहायता करना चाहते हो तो जरूर जाओ। मैंने तो उसे सलाह दी है कि बिल्कुल अकेले होने पर भी उसे 'इंडियन ओपिनियन' निकालना चाहिए। वह तुम्हें मेरा पत्र पढ़ने के लिए के लिए भेजेगा। यदि वह नहीं भेजे तो मंगवा लेना।

  1. गांधीजी १९१७ में मोतीहारी जाकर ठहरे थे, उसी के अनुसार वर्ष का निर्धारण किया गया है।
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