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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/१६८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय


मैं दो–तीन दिन में कलकत्ता जाऊंगा। बा और देवदास मेरे साथ जायेंगे। अभी नरहरिभाई और उसकी पत्नी मेरे साथ चम्पारन में है। वह राष्ट्रीय स्कूल में शिक्षक है। सुरेन्द्र भी यहां हैं। डा॰ देव[] तो हैं ही यह तो तुम जानते होगे। देव को पत्र लिखना। अगर उसे गुजराती में भी लिखोगे तो चलेगा। अलीगढ़ के तफज्जुल हुसैन खान जो कि टुंडला से हमारे साथ हो लिये थे, तुम्हें बहुत याद कर रहे थे। मैं तो अलीगढ़ जा चुका हूं।[]

आजकल यहां अच्छी ठंड हो रही है। अन्य लोग नये स्वयंसेवक हैं। तुम उन्हें नहीं जानते इसलिए उनके नाम नहीं भेज रहा हूं। शेष फिर।

बापू के आशीर्वाद

[पुनश्च:]

श्लोक जितनी जल्दी पढ़ना शुरू करोगे उतना ही अच्छा होगा।

बापू

[गुजराती से]

मोटाना मन, पृ॰ १५

१२६. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को

मोतीहारी
पौष शुक्ल २, १४ जनवरी, १९१८

चि॰ मथुरादास,

शिक्षा से सम्बन्धित खण्ड के अनुवाद पर तुम्हारी टीका अब मैं समझ सकता हूं। प्रस्तावना लिखने के विचार से मैंने उसे[] पढ़ना शुरू किया था। पहले ही वाक्य से घबरा गया। जैसे–जैसे पढ़ता गया घबराहट बढ़ती गई। मुझे लगता है कि इस अनुवाद को जनता के सामने रखें तो अन्याय ही होगा। इसलिए यह खर्च बेकार जायेगा, फिर भी हमारे पास कोई दूसरा प्रामाणिक उपाय नहीं है। फिलहाल यही निर्णय पर्याप्त हैं कि इस अनुवाद को यों ही रख लेंगे—मगर उसकी जिल्द न बंधाई जाये। दूसरे तथा तीसरे भागों को प्रथम खण्ड पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर दिया जायेगा। पृष्ठ संख्या नये सिरे से डाली जायेगी। तुम्हारे कहने पर यह समझा हूं कि हम इस खण्ड का प्रकाशन १९ फरवरी[] से पहले कर सकेंगे। अनुवाद की गुजराती भाषा बहुत सरल, स्वाभाविक व्याकरण सम्बन्धी दोषों से मुक्त और ऐसी होनी चाहिए कि साहित्य भण्डार में अच्छा स्थान पा सके। इस अनुवाद में ऐसा एक भी गुण दिखाई नहीं दे रहा है।

  1. डा॰ हरि श्रीकृष्ण देव
  2. २८ नवम्बर, १९१७ को
  3. गोपालकृष्ण गोखले के भाषणों का प्रथम खण्ड जिसका गुजराती में अनुवाद किया जा रहा था।
  4. गोपालकृष्ण गोखले की तीसरी बरसी
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