दिया था कि कोई भी सख्त कदम उठाने से पहले मैं स्थिति के बारे में अपने विचार महामान्य के समक्ष विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत करूंगा। आशा है कि महामान्य मेरे निवेदन पर समुचित ध्यान देंगे। यदि मेरी उपस्थिति वांछित होगी तो मैं प्रसन्नतापूर्वक महामान्य के दर्शन के लिए उपस्थित होऊंगा।
हृदय से आपका
मो॰ क॰ गांधी
अंग्रेजी की नकल (सी॰ डब्ल्यू॰ १०६५१) से। सौजन्य : छगनलाल गांधी
१४२. पत्र : एफ॰ जी॰ प्रैट को[१]
मिर्जापुर
२० मार्च, १९१८
मेरे पास इस आशय के सन्देश आ रहे हैं और एक अभी इसी समय आया है कि कई गांवों में तलाती गांववालों पर बकाया लगान अदा करने के लिए अनुचित दबाव डाल रहे हैं। मटर ताल्लुके से प्रतिवेदन आये हैं, जिनमें मुझे जिले में जाकर जांच करने और लोगों से बातचीत करने के लिए कहा गया है। खेड़ा जिले से हर जगह से लोग आकर कोई सार्वजनिक घोषणा करने की मांग कर रहे हैं। जैसा कि आपको विदित है, लोगों को सिवाय यह बताने कि उन्हें क्या करना चाहिए, मैंने सावधानी बरती है कि कोई भी सार्वजनिक घोषणा न करूं और न जन–आन्दोलन के लिए आह्वान करूं। सचमुच मैंने तो यहां तक किया है कि जिन दोस्तों पर मेरा प्रभाव है उनसे अखबारों में कोई चर्चा न करने को कहा है। सार्वजनिक घोषणा करने और सभाएं आदि करने से पहले मैं आपसे एक अन्तिम अनुरोध करना चाहता हूं। क्या यह सम्भव नहीं कि दूसरी किस्त की वसूली वस्तुतः सारे जिले के लिए आमतौर पर मुल्तवी करने की घोषणा कर दी जाये और साथ ही यह घोषणा भी की जाये कि सरकार इसके बावजूद सनदिया भूमिधारियों से सारा लगान अदा करने की आशा करती है? ऐसा करने से आन्दोलन से बचा जा सकेगा और यह एक शोभनीय रियायत होगी। मुझे विश्वास है कि इस मामले में परिस्थिति का यही तकाजा है।[२]
यदि जरूरत होगी तो मैं आपकी सेवा में हाजिर रहूंगा।
हृदय से आपका
मो॰ क॰ गांधी
अंग्रेजी की नकल (सी॰ डब्ल्यू॰ १६५५) से। सौजन्य : छगनलाल गांधी