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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/१९३

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१४९. पत्र : सर जेम्स डुबाले को

नडियाद
९ अप्रैल, १९१८

प्रिय सर जेम्स डुबॉले,

आपके कृपापूर्ण पत्र के लिए धन्यवाद। मैं जानता हूं कि हम एक-दूसरे की नीयत पर शक किये बगैर ईमानदारी से अलग–अलग राय कायम कर सकते हैं। मैं वचन देता हूं कि आप जो–कुछ कहेंगे मैं उसका गलत अर्थ नहीं लगाऊंगा।

जिस समय मैंने खेड़ा संघर्ष प्रारम्भ किया उस समय मुझे कतई ख्याल नहीं था कि मैं समूची राजस्व व्यवस्था पर हमला कर रहा था। मैं समझता था कि मेरी दृष्टि में जनता के प्रति जो घोर अन्याय हो रहा था उसी पर मैं हमला कर रहा था। साथ ही यह स्वीकार करता हूं कि संघर्ष तो मैं प्रारम्भ करता ही, भले ही उसका अर्थ सारी राजस्व व्यवस्था पर हमला करना क्यों न होता। युद्ध निरन्तर मेरे सामने था और मुझे यह बोध था कि यदि मैं युद्ध की कार्यवाही मैं सक्रिय सहयोग नहीं प्रदान कर सकता तो मुझे कम–से–कम एक कानून के मुताबिक चलनेवाले नागरिक और ब्रिटिश संविधान का प्रेमी होने के नाते सरकार के लिए परेशानी पैदा करने से तो हिचकना चाहिए था। जहां तक हो सकता था मैंने यह करने की कोशिश की है। मगर क्या युद्ध को अन्याय पर पर्दा डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या सरकार को सच्चे जनमत की अवज्ञा करने से बाज नहीं आना चाहिए? मैं यह नहीं कहता कि खेड़ा के मामले में लोक–निर्णय को मान ही लिया जाये, मगर जोरदार मतभेद होने पर मध्यस्थता का सहारा लिया जाना चाहिए। तलातियों के लिए या उस मामले से सम्बद्ध अन्य किसी व्यक्ति के लिए विशेषणों का प्रयोग करने में मुझे आनन्द नहीं आता। मगर मैं जानता हूं कि जहां इन विशेषणों से वस्तुपरक तथ्य प्रकट होते हैं वहां इनका इस्तेमाल न करना निजी मामलों में मिथ्या विनयशीलता और सार्वजनिक मामलों में कठिन उत्तरदायित्व से जी चुराना माना जायेगा। मेरी इच्छा है कि आप भी वास्तव में उन बातों को उसी तरह जान लें जिस तरह मैं जान चुका हूं। तब जैसी भाषा मैंने इस्तेमाल की है आप उससे भी सख्त भाषा इस्तेमाल करेंगे। मैंने जिस समिति की मांग की है। वह गठित होने दें, तो मैं आपको बताऊंगा कि उनके आंकड़े कहां तक सही है और शायद यह भी बता दूं कि सही आंकड़े क्या हैं। मगर यहां गलती उन लोगों की नहीं है। वे जिस व्यवस्था के अन्तर्गत कार्य कर रहे हैं वही उन्हें ऐसा बनाती है। फिर भी मेरे लिए यह सवाल पत्र में चर्चा करने के लिए बहुत बड़ा है।

मेरे सामने विकल्प बिलकुल स्पष्ट है। या तो मुझे किसानों के असन्तोष को अन्दर–ही–अन्दर सुलगता हुआ मगर भय के कारण छुपा रहने देना होगा अथवा मुझे उस असन्तोष को

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