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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 91.pdf/१९७

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पत्र: एन॰ जी॰ चन्दावरकर को

बनाकर रखना सबसे आसान लगता है, इसलिए नहीं कि मेरे–उनके विचार संयोगवश बहुत जल्दी मिलते हैं, बल्कि मैं उनकी धर्माधर्म की भावना को आकर्षित करता हूं और उनके साथ धीरज रखता हूं। मेरे तरीकों को बेहतर वे अपने तरीकों के स्थान पर मेरे तरीके अपनाते हैं। वे घृणा के बदले प्रेम करने की कोशिश करते हैं। इसी तरह आप भी उन्हें अपना बना सकते हैं।

नडियाद और अहमदाबाद दोनों स्थानों के होमरूल वालों के पास सम्भवतः आपके आरोपों का ठोस जवाब है। मेरे साथ उनके स्वार्थरहित सम्बन्ध होने के कारण मुझे सोचना पड़ता है कि वे म्युनिसिपल सम्बन्धी मामलों में घृणित उद्देश्यों से प्रेरित नहीं हो सकते। मेरा कहना है कि आप उनपर विश्वास करके उनका सहयोग प्राप्त करें।

खेड़ा की जनता मेरे आदेशों का पालन आंखें मूंदकर नहीं करती। उन्हें ऐसा करने भी नहीं दिया जाता। मुझे कोई सन्देह नहीं कि यदि वे मेरी सलाह पर अन्ततः चलेंगे तो उनका नैतिक उत्थान अवश्यमेव होगा। क्योंकि जानते–बूझते हुए कष्ट सहन करके क्या कोई राष्ट्र बुलन्दियों तक नहीं पहुंच जाता? दक्षिण आफ्रिका के सविनय प्रतिरोधक आज सरकार के सबसे बड़े समर्थक हैं। सरकार अन्ततः न्याय करती है, इसी विश्वास पर उनका प्रतिरोध आधारित था।

क्या आपने मेरे और हड़तालियों के साथ बेदर्दी के साथ नाइन्साफी नहीं की? क्या आपको भरोसा है कि हड़तालियों ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी है? आपका चाहे जो विश्वास हो मगर आपका यह कहना कि हड़तालियों ने जान–बूझकर प्रतिज्ञा भंग की है, निश्चय ही बड़ी निष्ठुर चोट है। हड़तालियों की सभा में दिये आपके भाषण का असर मुझपर वैसा नहीं हुआ जो खेड़ा के काश्तकारों की सभा में हुआ था।[] यदि मैं प्रतिज्ञा भंग करनेवाले हड़तालियों में से हूं तो आपने मेरी प्रशंसा में जो शब्द कहे हैं मैं उसके योग्य नहीं हूं।

अंग्रेजी की नकल (सी॰ डब्ल्यू॰ १०६८०) से। सौजन्य : छगनलाल गांधी

१५४. पत्र : एन॰ जी॰ चन्दावरकर को

नडियाद
१५ अप्रैल, १९१८

प्रिय महोदय नारायण,

यह रहा श्री प्रैट का भाषण। मैं जो पाठ भेज रहा हूं वह मेरे रिपोर्टर द्वारा ली गई शाब्दिक रिपोर्ट का सम्पूर्ण अनुवाद है। मैं आपको अपने जवाब की नकल भी भेज रहा हूं। साथ श्री घोषाल द्वारा तैयार की गई बड़थाल की आनावारी की रिपोर्ट और उसके बाद हुआ पत्र–व्यवहार भी भेज रहा हूं। यदि उसे समझने में दिक्कत हो तो मुझे बताइयेगा। बड़थाल के पत्र–व्यवहार से

  1. देखिए "कमिश्नर एफ॰ जी॰ प्रैट का भाषण", १२-४-१९१८ और गांधी जी के उत्तर के लिए देखिए "पत्रः बॉम्बे क्रानिकल को", १५-४-१९१८।
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