३ जून के पत्र में लिखा था — "उत्तरसंडा के मामलातदार ने जो आदेश जारी किया है उस तरह के आदेश जारी करें, तो मैं समझता हूं कि चौथाई वसूल नही की जायेगी।" आपने उत्तर में लिखा था, "जो लोग अभी भी लगान अदा करने के लिए आगे आते हैं उनसे चौथाई जुर्माना वसूल नहीं किया जायेगा।" ऐसी स्थिति में आपके पत्र का आशय अपने पिछले इरादों में परिवर्तन करना है। मुझे विश्वास है कि पहले आपका जो इरादा था, उसे ही कार्यान्वित करेंगे। आगे यह भी कह दूं कि ८ जून को नडियाद की सार्वजनिक सभा में मैंने आपके शुरू के इरादों के अनुसार ही घोषणा करके लोगों से कहा था कि अब केवल समझौते की तारीख से पहले वसूली गई चौथाई वापस मिलने का प्रश्न ही रह जाता है। मैंने कहा था कि जहां लोग लगान अदा करने में समर्थ है वहां उनके तत्काल लगान अदा करने पर ही चौथाई की रकम वापस मिलने की सम्भावना है।
वड़थाल के ३ मामलों के सम्बन्ध में मैं यह स्वीकार करता हूं कि एक मामले में गांववालों ने कुर्क की गई सम्पत्ति की पूरी कीमत तक बोली नहीं लगने दी। मगर अन्य दो मामलों में उनकी योजना असफल रही और भैंसों की पूरी कीमत तक बोली में स्पर्धा बनी रही। इस तरह दो मामलों में स्वभाविक कारणों से चौथाई अदा न हो सकी। आपका यह तर्क कि यदि कुर्क की गई सम्पत्ति की नीलामी से पूर्ण राशि वसूल हो जाती तभी रकम वापस करने का प्रश्न पैदा हो सकता था, चौथाई वसूली के दूसरे मामलों पर भी लागू होता है। जिन मामलों में धोखेबाजी प्रमाणित को जा सकती है सिर्फ उन्ही मामलों में भेद किया जा सकता है। मैं विनम्रतापूर्वक इस बात का खण्डन करता हूं कि तीसरे मामले में किसी प्रकार की धोखेबाजी की गई थी। यह सभी तरीकों से सरकार को चौथाई वसूल न करने देने की चाल का एक हिस्सा मात्र था।
जब्ती के सम्बन्ध में जिन मामलों में मूल धारकों की हाल ही में मृत्यु हो चुकी है, उनके बारे में आपने विचार करने की बात कही हैं उसके लिए धन्यवाद। अन्य दो मामले चौथाई के सम्बन्ध में आपसे अपने आदेशों में संशोधन करने के मेरे अनुरोध के अन्तर्गत आते हैं।
जिस मामले में दो आने की बकाया रकम के लिए चौथाई वसूल की गई उसके बारे में मैं आगे जांच करवा रहा हूं।
आपके पत्र के अन्तिम अनुच्छेद के बारे मैं यही कह सकता हूं कि आपके साथ अपनी बातचीत में और मामलातदार के साथ हुई बातचीत में मैंने सारे समय लगान मुल्तवी करने की बात कही थी। मैंने अपने ३ जून के पत्र में इस बात का उल्लेख भी किया है। मामलातदार के आदेश को मैंने लगान मुल्तवी का आदेश कहा था। आपने ४ जून के अपने पत्र में मेरी इस व्याख्या का खण्डन भी नहीं किया था। वास्तव में मामलातदार का आदेश स्पष्ट रूप से लगान मुल्तवी का आदेश ही है, जो मेरी उनके साथ हुई बातचीत के परिणामस्वरूप जारी किया गया था। मेरी विनम्र राय में ऐसे निर्णय को, जिसपर लोग अमल कर चुके हों, बदलना सम्भव नहीं है। शायद आप