१७१. पत्र : जे॰ एल॰ मैफी को
नडियाद
२५ जून, १९१८
मैंने आपके ४ जून के पत्र का उत्तर जान–बूझकर नहीं दिया था, क्योंकि मैं उन विभिन्न मामलों के बारे में, जिनका उल्लेख हमारे पत्र–व्यवहार अथवा बातचीत के दौरान हुआ था, आपको खबर देना चाहता था।
खेड़ा का मामला स्थानीय तौर पर निपट गया था। मैंने उसे एक अशोभनीय समझौता कहा था।[१] आपने उस सम्बन्ध में मेरा पत्र देखा होगा। यदि नहीं देखा है तो मैं इसके लिए आपको दोष नहीं दूंगा। यदि मुझे जल्दी–से–जल्दी भर्ती शुरू करने की इच्छा न होती तो मैं समझौते के अनेक पहलुओं से सन्तुष्ट न हो गया होता।
मैं बम्बई सम्मेलन में बाकायदा शामिल हुआ था। लॉर्ड विलिंग्डन की गम्भीर भूल[२] से जो विश्वास–भंग हुआ, उसकी पूर्ति के लिए मैं जो कुछ कर सकता था वह मैंने किया। सम्भवतः आप यह मानते ही न हों कि वह एक गम्भीर भूल थी। मुझे अभी भी लगता है कि लॉर्ड विलिंग्डन अपनी भूल शालीनतापूर्वक स्वीकार कर सकते थे और मैं उनसे ऐसा कहने में झिझका भी नहीं हूं। इससे मेरी कठिनाई अवश्य बढ़ गई। तो भी मुझे इससे निरुत्साह होने की आवश्यकता नहीं है। मैं अपने प्रयत्न जारी रखूंगा।
दिल्ली से लौटने के बाद से ही मैं गुजरात में सैनिकों की लगातार सक्रिय रूप से भर्ती किये जाने के पक्ष में जनमत संगठित करने में कार्यरत रहा हूं। हमारे इस ओर के लोग सैनिक नहीं बनते। मैं अपनी ओर से इस कमी को दूर करने का कड़ा प्रयास कर रहा हूं। भर्ती के लिए आगे आने के लिए लोगों को प्रलोभन देने के लिए कई बैठकें आयोजित की गई है। सार्वजनिक रूप से इस अभियान का श्रीगणेश २१ जून को हुआ था।[३] अब तक कोई ठोस परिणाम दिखाये नहीं जा सकते। अब हमारे कार्यकर्त्ता लोगों से बातचीत करने के लिए गांवों में गये हैं। गांववालों के
- ↑ देखिए "सन्देश : खेड़ा के लोगों को", ६-६-१९१८।
- ↑ यहां १० जून को बम्बई प्रान्तीय युद्ध सम्मेलन में लॉर्ड विलिंगडन द्वारा बा॰ गं॰ तिलक और केलकर को राजभक्ति सम्बन्ध प्रस्ताव पर बोलने से रोकने की घटना का उल्लेख है। इसके विरोधस्वरूप बा॰ गं॰ तिलक, गांधीजी, मु॰ अ॰ जिन्ना, बी॰ जी॰ हॉनिमैन, न॰ चि॰ केलकर और आर॰ पी॰ करंदीकर हाल से बाहर आ गये थे इस सम्बन्ध में गांधीजी के भाषण और पत्र–व्यवहार के लिए देखिए "पत्र : लॉर्ड विलिंगडन को", ११-६-१९१८ और "भाषण : बम्बई की सभा में", १६-६-१९१८।
- ↑ देखिए "भाषण: नडियाद में", २१-६-१९१८।