मुझपर कितनी जिम्मेदारी है, यह मैं कह नहीं सकता। मैं ऐसा मानता हूं कि इस विषय में आपके और परमात्मा के प्रति जवाबदेह रहूंगा। इस पैसे के उपयोग के विषय में मैंने बहुत भाइयों तथा बहनों से राय मांगी है और उसीके अनुसार मैं इसका उपयोग करूंगा। मैं इस समय जो मांग रहा हूं उसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि हिन्दुस्तान में सतयुग फिर से आ जाये। एक समय तो स्वर्णयुग था। उस युग में स्त्री और पुरुष सरल भाव तथा सरलनीति से सत्य ही बोलते थे। उस युग में स्त्रियां अपनी पवित्रता बनाये रखती थीं। उन दिनों स्त्री–पुरुषों के एक साथ रहने पर भी किसी दिन भी कोई बुरा विचार नहीं आता था। यह तो सतयुग या स्वर्ण युग की बात है।
इस कलयुग में तो स्त्रियों को अपनी पवित्रता बनाये रखनी मुश्किल है। मैं जब दाहोद गया था तो मुझे किसी ने बताया कि यहां पिछले दो वर्षों से स्त्रियां किसी भी तरह का कोई काम नहीं कर रही थी। लेकिन अब वे मजदूरी करती हैं। वहां के पुरुष बुनकर हैं और पहले स्त्रियां उनके काम में हाथ बंटाती थीं। इस तरह उनकी पवित्रता की रक्षा होती थी, लेकिन अब उनकी स्थिति सूत कातने की नहीं रहीं, इसलिए वे मजदूर के रूप में काम करने लगी है। वहां स्त्रियों की दशा बहुत खराब है। उनसे काम लेनेवाले ओवरसियर उनपर बहुत जुल्म करते हैं।
हमें हिन्दुस्तान में जो काम करना है उसमें स्त्री–शिक्षा का काम सबसे पहला है। स्त्रियां यदि शिक्षित होंगी तो वे अपनी पवित्रता की रक्षा कर सकती हैं। उनको शिक्षित करने के लिए बहुत विद्धता की जरूरत नहीं है, केवल चरित्र की आवश्यकता है। इसमें पैसे की जरा भी जरूरत नहीं। आज चार सौ मुस्लिम स्त्रियां अपनी रक्षा स्वयं कर रही हैं और कताई से पर्याप्त पैसा कमा रही हैं।
आज मुझपर आपने जो प्रेम दिखाया है उसके आधार पर में आपसे यह चाहता हूं कि मुझे वह प्रेम दिखाइए जिससे फिर से सतयुग आ जाये। हिन्दुस्तान अपनी रक्षा स्वयं कर सकता है। यदि हम अपने देश में बने कपड़े का ही इस्तेमाल करें तो हम थोड़े से समय में ही देश को सुरक्षित बना सकेंगे। मैं चरखे के द्वारा यह प्रयत्न कर रहा हूं। चरखे से स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा की जा सकती है। ऐसा दूसरा कोई काम नहीं है जिससे करोड़ों स्त्रियां घर बैठे अपने समय का उपयोग कर सकती हों। इसमें कोई बहुत ज्यादा अकल की जरूरत नहीं है। हिन्दुस्तान को आत्म–निर्भर होना सीखना ही चाहिए। यदि हिन्दुस्तान में वीर पुरुष और वीरांगनाएं हों तो हम आत्म–निर्भर बन सकते हैं। हमें सत्याग्रह की वीरता दिखानी है। इसमें शस्त्रों की वीरता से अधिक वीरता की जरूरत होती है। यदि हो जाये तो हम आज ही स्वतन्त्र हो जायें। हिन्दुस्तान से जानेवाले करोड़ों रुपयों और अपनी स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करो। यदि आप केवल एक घंटे ही मेहनत करें तो भी आप बहुत अच्छा काम कर सकते हैं।
आपने मुझपर पर अगाध प्रेम दिखाया है। आप इन पैसों को कम कहते हो लेकिन ये अकूत हैं। स्वेच्छा तथा शुभकामना से दिया दान जरूर फलदायी होगा। यह तो मेरे लिए अरबों रुपयों के समान है इसलिए यह मत सोचिए कि यह कम है। मैं आपसे जिस कार्य को करने के लिए कह रहा हूं यदि उसे आप ठीक समझते हैं तो अपने–आपको देश की खातिर कार्य करने के लिए तैयार कर लीजिए।
[गुजराती से]
बापुनी शीतल छायामां, पृ॰ ९१–९५