२२५. पत्र : मथुरादास त्रिकमजी को
लाहौर
शुक्रवार, [७ नवम्बर, १९१९ या उसके पश्चात्][१]
तुम्हारा पत्र मिल गया था। खिलाफत के विषय में मेरे सम्पूर्ण विचार तुम 'नवजीवन' में जान लोगे।
तुम स्वदेशी के बारे में क्या कर रहे हो? सभी चरखों की मरम्मत की व्यवस्था करो। वहां [चरखा] कक्षाओं की क्या दशा है? नरनारायण में क्या चल रहा है? मैंने स्वदेशी के विषय में पत्र नहीं भेजे है, क्योंकि कुछ समस्याओं का समाधान वहीं हो सकता है। यदि इसकी व्यवस्था आश्रम में ही करनी हो तो मेरे विचार में यह आश्रम के द्वारा ही हो सकती है तो भी, क्या करना है, इस विषय में सोच रहा हूं।
तब तक के लिए मैं चाहता हूं कि तुम स्वदेशी सभा का काम देखो। यदि तुम इसमें पूरी तरह मशगूल हो जाओ तो मुझे विश्वास है कि बहुत अच्छा काम हो सकेगा। अच्छा होगा यदि तुम और भाई उमर मिलकर स्वदेशी के कार्यक्रम को आगे बढ़ाओ।
बापू के आशीर्वाद
क्या तुम कांग्रेस अधिवेशन[२] के समय आने का विचार कर रहे हो?
मूल गुजराती से : प्यारेलाल पेपर्स। नेहरू–स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय; सौजन्य : बेलादेवी नैयर और डॉ॰ सुशीला नैयर
- ↑ वर्ष का निर्धारण पत्र के पाठ के आधार पर किया गया है। लगता है कि यह पत्र १ नवम्बर १९१९ को मथुरादास को लिखे पत्र के समय ही लिखा गया था। उसके बाद शुक्रवार ७ नवम्बर को था। खिलाफत के सम्बन्ध में गांधीजी के विचार 'नवजीवन' के ९-११-१९१९ और ७-१२-१९१९ के अंकों में छपे थे; देखिए "टिप्पणियां", ९-११-१९१९ और "पंजाब की चिट्ठी", ७-१२-१९१९।
- ↑ अधिवेशन २९ दिसम्बर, १९१९ से १ जनवरी १९२० तक होने वाला था।